‘सरदार ने किसानों से कहा पोल्सन को भगाओ, मोदी ने कहा पोल्सन से लिपट जाओ’

दलील का दलिया बना दिया है सरकार ने। किसान आंदोलन को बोगस बताने के लिए दलीलों की नित नई सप्लाई हो रही है। अब मार्केट में दूध कारोबार का लॉजिक लाँच किया गया है। प्रधानमंत्री कहते हैं कि भारत में कृषि और सहायक सेक्टर का कारोबार 28 लाख करोड़ का है और इसमें से 8 लाख करोड़ अकेले दूध उत्पादन का है। बिना समर्थन मूल्य और मंडी ख़रीद के खुले बाज़ार के कारण ऐसा हुआ है। इस उदाहरण के साथ खेती के बचे हुए हिस्से को भी खुले बाज़ार में झोंक देना चाहिए।

कारोबार का आकार 8 लाख करोड़ का बता देने से किसानों की हालत का अंदाज़ा नहीं मिलता। तब तो इसी लॉजिक से भारत की खेती 28 लाख करोड़ की है तो किसान और अमीर होना चाहिए। प्रधानमंत्री को पता है कि गोदी मीडिया दूध उत्पादन की सच्चाई के लिए मेहनत नहीं करेगा इसलिए कुछ भी बोल दो। अख़बार में छप जाएगा और चैनलों में चल जाएगा। उन्होंने यह नहीं बताया की कि इस आठ लाख करोड़ के कारोबार में कंपनियों के मुनाफ़े का हिस्सा कितना है और किसानों के मुनाफ़े का कितना।

सरदार पटेल सब नहीं हो सकते। उनका फ़ोटो लेकर कमरा सजाने वाले बहुत मिल जाएँगे। यही सरदार थे जिन्होंने खेड़ा के किसानों से कहा कि पोल्सन कंपनी को भगाओ। इस कंपनी का खेड़ा पर एकाधिकार हो गया था। दूध के दाम नहीं देती थी। किसानों ने आंदोलन किया और सरदार पटेल के प्रोत्साहन से कोपरेटिव बनाई। मोदी जी कहते हैं पोल्सन को भगाओ नहीं। पोल्सन को गले लगा लो। किसान कहते हैं कि पोल्सन को भगाओ। पूरी सरकार आज की पोल्सन कंपनियों की वकालत में खड़ी है। मूर्ति बनाने से आप पुजारी नहीं हो जाते हैं और न मूर्ति का व्यापारी पुजारी होता है।

दूसरी तरफ़ दूध उत्पादक हैं जो बता रहे हैं कि लागत नहीं निकल रही है। खेती के घाटे को सपोर्ट करने के लिए गाय भैंस पाल ली लेकिन उससे घाटा और बढ़ गया। क्यों किसानों को दाम नहीं मिलता है? इसका जवाब यही है कि सरकार और कंपनी दोनों चाहते हैं कि किसान गरीब रहे। किसान आंदोलन पर प्राइम टाइम के 19 वें एपिसोड में आप इसकी कुछ झलक देख सकते हैं। जब राष्ट्र की नियति में झूठ लिखा है, दूध की सच्चाई नहीं तो क्या किया जा सकता है। बस कोशिश की जा सकती है कि आप सरकार के झूठ से मुक्त हो सकें।