जयपुर में मदरसे के दो विद्यार्थियों ने बनाया एक बैठक में पूरा कुरआन

जयपुर। सूरजपोल स्थित पहाड़गंज के मदरसा दारुल उलूम नूरी सुन्नी सेंटर में पिछले कुछ वर्षों से धार्मिक पवित्र ग्रंथ कुरआन शरीफ एक बैठक में सुनाने की पवित्र परंपरा चल रही है, जिसके अंतर्गत अब तक कई हाफिज विधार्थी पूरा कुरआन एक-एक बैठक में सुना चुके हैं। हर वर्ष की तरह इस साल भी 23-24 फरवरी 2020 को दो हाफिजों ने सुबह 9:00 बजे से रात्रि 9:00 बजे तक 12 घंटे में बिना देखे अपने कक्षा अध्यापक हाफिज मोहम्मद शरीफ कादरी को पूरा कुरआन सुनाया। इस बार के प्रथम हाफिज यूपी के जिला बहराइच के निवासी (1) हाफिज मोहम्मद शकील क़ादरी और (2) दित्तीय हाफिज जयपुर निवासी हाफिज मोहम्मद शादाब रज़ा हैं।

दारुल उलूम नूरी सुन्नी सेंटर के प्रधानाध्यापक मौलाना इरफ़ान बरकाती ने बताया: एक बैठक में पूरा कुरआन सुनाने की परंपरा जयपुर में सर्वप्रथम हमने प्रारंभ की है और हमारे विद्यार्थी अपनी कठोर मेहनत से हमारी इस परंपरा को हर वर्ष आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने बताया कि हम एसा इस लिए करते हैं ताकि हमारे विधार्थियों का अपनी याददाश्त पर भरोसा बढ़े। उन्होंने यह भी बताया कि हमने इस भरोसे का अच्छा परिणाम देखा है और हमारे ऐसे विधार्थी जब रमजान के पवित्र महीने में तरावीह की नमाज़ पढ़ाते हैं, दूसरे हाफिजों की तुलना में उन्हें बड़ी आसानी होती है।

इन हाफिजों के विशेष कक्षा अध्यापक हाफिज मोहम्मद शरीफ क़ादरी ने बताया कि ये बच्चे जब पवित्र क़ुरआन सुनाना प्रारंभ करते हैं तो पवित्र ग्रंथ के 30 पारे पूरे किए बिना शौच या भोजन जैसी केवल अनिवार्य स्थति में ही थोड़ी देर के लिए रुकते हैं, वरना बिना थके हुए बड़ी प्रसन्नता के साथ सुनाते चले जाते हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या ये बच्चे थकते नहीं? अध्यापक ने अपना अनुभव बताते हुए कहा: केवल एक दिन में इतना ज्यादा दिमाग वाला कार्य कर पाना संभव नहीं होता, इसके लिए कई महीनों तैयारी करनी होती है और उस तैयारी के साथ ही एक बैठक में सुनाने की आदत भी पड़ जाती है, इस लिए इन्हें इससे कोई समस्या नहीं होती बल्कि जैसे जैसे पारे पूरे होते हैं, उन्हें प्रसन्नता महसूस होती है।

ज्ञात रहे कि पवित्र क़ुरआन में 30 पारे हैं और प्रत्येक पारे में ए4 साइज के लगभग 14 पृष्ठ होते हैं। जो लोग उन तमाम पारों को बिना देखे मुंह जबानी याद कर लेते हैं, उन्हें हाफिज कहा जाता है। रमजान के पवित्र महीने में विशेष रुप से पढ़ी जाने वाली नमाज तरावीह में हाफिज लोग 30 पारे मुंह जबानी सुनाते हैं और तमाम लोग पीछे खड़े होकर सुनते हैं।

कुरआन को याद करने के लिए सामान्य रूप से 3 वर्ष चाहिए। कुरआन के हाफिज रोजाना 1-1 पारे की तिलावत कर कुरआन दोहराते रहते हैं ताकि उन्हें कुरआन याद रखने में ज्यादा परेशानियों का सामना ना हो। पवित्र क़ुरआन पूरे जगत में इकलौती पुस्तक है जिसको मुंह जबानी याद करने वाले पूरी दुनिया में बहुत बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। साइंस का यह मानना है कि जो बच्चे बिना देखे पूरा कुरआन याद कर सकते हैं, यदि उन पर विशेष रूप से मेहनत की जाए तो वो दुनिया की कठोर से कठोर और बड़ी से बड़ी परीक्षा दे सकते हैं।


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