सुप्रीम कोर्ट का फैसला – प्रवासी मजदूरों से ट्रेन और बस का किराया न वसूला जाए

लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों को अपने घरों तक पहुंचाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच किराये को लेकर तनातनी जारी है। ऐसे में कई राज्य सीधे प्रवासी मजदूरों से ही किराया वसूल कर रहे है। हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी है।

वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर की याचिका पर कोर्ट ने कहा कि ट्रेनों और बसों से सफर कर रहे प्रवासी मजदूरों से किसी तरह का किराया ना लिया जाए। यह खर्च राज्य सरकारें ही उठाएं। कोर्ट ने आदेश दिया कि फंसे हुए मजदूरों को खाना मुहैया कराने की व्यवस्था भी राज्य सरकारें ही करें। इस मसले पर अगली सुनवाई अब 5 जून को होगी।

न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने इन कामगारों की वेदनाओं का स्वत: संज्ञान लिये गये मामले में वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिये केन्द्र की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता से विभिन्न जगहों पर फंसे हुए इन श्रमिकों की यात्रा के किराये के भुगतान को लेकर व्याप्त भ्रम के बारे में जानकारी चाही। पीठ ने कहा कि इन श्रमिकों को अपनी घर वापसी की यात्रा के लिये किराये का भुगतान करने के लिये नहीं कहना चाहिए।

पीठ ने मेहता से सवाल किया, ‘‘सामान्य समय क्या है? यदि एक प्रवासी की पहचान होती है तो यह तो निश्चित होना चाहिए कि उसे एक सप्ताह के भीतर या दस दिन के अंदर पहुंचा दिया जायेगा? वह समय क्या है? ऐसे भी उदाहरण हैं जब एक राज्य प्रवासियों को भेजती है लेकिन दूसरे राज्य की सीमा पर उनसे कहा जाता है कि हम प्रवासियों को नहीं लेंगे, हमें इस बारे में एक नीति की आवश्यकता है।’’

पीठ ने इन कामगारों की यात्रा के भाड़े के बारे में सवाल किये और कहा, ‘‘हमारे देश में बिचौलिया हमेशा ही रहता है। लेकिन हम नहीं चाहते कि जब भाड़े के भुगतान का सवाल हो तो इसमें बिचौलिया हो। इस बारे में एक स्पष्ट नीति होनी चाहिए कि उनकी यात्रा का खर्च कौन वहन करेगा।’’

गौरतलब है कि देश में कोरोना मरीजों का आंकड़ा 1.51 लाख के पार पहुंच गया है। अब तक 4 हजार 337 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि ठीक होने वालों का आंकड़ा 64 हजार से अधिक है। देश में 83 हजार से अधिक एक्टिव केस हैं। महाराष्ट्र में कोरोना का आंकड़ा 54 हजार को पार कर गया है।


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