जब मराठों ने लूटा था श्रृंगेरी शंकराचार्य का मंदिर और मठ, टीपू सुल्तान ने की थी मदद

टीपू सुल्तान का जन्म 10 नवम्बर 1750 को कर्नाटक के देवनाहल्ली (यूसुफ़ाबाद) (बंगलौर से लगभग 33 (21 मील) किमी उत्तर मे) हुआ था। आज उनकी जयंती है।

जीवन परिचय

टीपू सुल्तान का जन्म 10 नवम्बर 1750 को कर्नाटक के देवनाहल्ली (यूसुफ़ाबाद) (बंगलौर से लगभग 33 (21 मील) किमी उत्तर मे) हुआ था। उनका पूरा नाम सुल्तान फतेह अली खान शाहाब था। उनके पिता का नाम हैदर अली और माता का नाम फ़क़रुन्निसा था। उनके पिता हैदर अली मैसूर साम्राज्य के सैनापति थे जो अपनी ताकत से 1761 में मैसूर साम्राज्य के शासक बने। टीपू को मैसूर के शेर के रूप में जाना जाता है। योग्य शासक के अलावा टीपू एक विद्वान, कुशल़॰य़ोग़य सैनापति और कवि भी थे।

18 वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में हैदर अली का देहावसान एवं टीपू सुल्तान का राज्यरोहन मैसूर कि एक प्रमुख घटना है टीपू सुल्तान के आगमन के साथ ही अंग्रेजों कि साम्राज्यवादी नीति पर जबरदस्त आधात पहुँचा जहाँ एक ओर कम्पनी सरकार अपने नवजात ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के लिए प्रयत्नशील थी तो दूसरी ओर टीपू अपनी वीरता एवं कुटनीतिज्ञता के बल पर मैसूर कि सुरक्षा के लिए दृढ़ प्रतिज्ञा था वस्तुत:18 वी शताब्दी के उत्तरार्ध में टीपू एक ऐसा महान शासक था जिसने अंग्रेजों को भारत से निकालने का प्रयत्न किया। अपने पिता हैदर अली के पश्चात 1782 में टीपू सुल्तान मैसूर की गद्दी पर बैठा।

अपने पिता की तरह ही वह अत्याधिक महत्वांकाक्षी कुशल सेनापति और चतुर कूटनीतिज्ञ था यही कारण था कि वह हमेशा अपने पिता की पराजय का बदला अंग्रेजों से लेना चाहता था अंग्रेज उससे काफी भयभीत रहते थे। टीपू की आकृति में अंग्रेजों को नेपोलियन की तस्वीर दिखाई पड़ती थी। वह अनेक भाषाओं का ज्ञाता था अपने पिता के समय में ही उसने प्रशासनिक सैनिक तथा युद्ध विधा लेनी प्रारंभ कर दी थी। प्रजा के तकलीफों का उसे काफी ध्यान रहता था। अत: उसके शासन काल में किसान प्रसन्न थे वह मुसलमान होते हुए भी धर्मान्त नहीं था वह हिन्दु, मुस्लमानों को एक नजर से देखता था बहुत बड़ा सुधारक भी था और शासन के प्रत्यक्ष क्षेत्र में सुधार लाने की चेष्टा की।

मराठा हिंदू थे, फिर भी उन्होंने श्रृंगेरी मठ पर हम’ला किया!

भारतीय उपमहाद्वीप 1700 की शताब्दी के आखिरी सालों में मंझदार में फंसा दिख रहा था। अब तक मुगल सिर्फ नाममात्र के शासक रह गए थे। देश के अधिकांश हिस्सों में सत्ता का असल नियंत्रण उनके हाथ से निकल चुका था। पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद यह उम्मीद भी खत्म होती दिख रही थी कि मराठा उनकी जगह ले लेंगे। इस लड़ाई में अफगानों ने मराठों को बुरी तरह हराया था। यानी उपमहाद्वीप के शासकों की सत्ता एक तरफ कमजोर हो रही थी तो दूसरी तरफ अंग्रेजों के सितारे बुलंद हो रहे थे।

इस दौर में 1789 में अंग्रेजों ने मराठों और हैदराबाद के निजाम को अपनी तरफ मिला लिया। ताकि अपनी राह के आखिरी कांटे को भी हटाया जा सके। यह कांटा था, मैसूर का शासक टीपू सुल्तान, जिसने दूसरे कई शासकों की तुलना में काफी पहले ही ईस्ट इंडिया कंपनी से पैदा होने वाले खतरे और उससे मिलने वाली चुनौती को भांप लिया था।

उस वक्त मराठा और टीपू सुल्तान एक-दूसरे को पसंद नहीं करते थे। यहां तक कि इस आपसी बैर की वजह से दोनों पक्षों के बीच लड़ाई वक्त से पहले ही शुरू हो गई थी। दरअसल, सबसे पहले टीपू के पिता हैदर अली ने भयंकर संघर्ष के बाद मराठाओं से देवनहल्ली (बेंगलुरू के पास) का किला छीन लिया था। जवाब में 1791 में रघुनाथ राव पटवर्धन के नेतृत्व में मराठों ने मैसूर जिले के बेदनूर पर जवाबी ह’मला किया। इसी हमले के दौरान उन्होंने श्रृंगेरी मठ को नुकसान पहुंचाया।

बाद में टीपू सुल्तान ने मठ के जीर्णोद्धार में भी मदद की थी

वैसे, लड़ाइयों के दौरान मठ-मंदिरों पर हमले करना मराठों के लिए कोई असाधारण बात नहीं थी। उदाहरण के लिए यह बहुत कम लोगों को ही पता होगा कि उन्होंने 1759 में तिरुपति मंदिर पर भी हम’ला किया था और उसे काफी नुकसान पहुंचाया था। हालांकि श्रृंगेरी का मंदिर और मठ कोई साधारण नहीं था। इसे हजारों साल पहले हिन्दुओं के अद्वैत दर्शन के प्रणेता आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया था। उन्होंने देश के हर कोने पर इस तरह के मठ-मंदिर स्थापित किए थे। दक्षिण में श्रृंगेरी था तो उत्तर में जोशीमठ, पश्चिम में द्वारका और पूर्व में पुरी की स्थापना उन्होंने की थी।

अपनी इसी अहमियत की वजह से श्रृंगेरी के मठ की प्रतिष्ठा काफी थी। इसकी स्थापना के बाद से ही हिन्दू और मुस्लिम दोनों शासकों ने इसकी प्रतिष्ठा और गरिमा को अब तक कायम रखा हुआ था। टीपू ने इस परंपरा को जारी रखा था। मठ के साथ उनका नजदीकी संबंध था और वे समय-समय पर उसे अपनी तरफ से तमाम उपहार भी भेजते रहते थे। मठ को उन्होंने बहुत सी जमीन भी दान में दे रखी थी। यहां तक कि निजी संवाद के दौरान टीपू मठ के स्वामी को ‘जगद्गुरु’ (विश्व के गुरु) के संबोधन से संबोधित किया करते थे।

मठ की इस प्रतिष्ठा का अर्थ यह भी था कि उसके पास काफी धन-दौलत थी। संभवत: इसी वजह से मराठों ने उसे निशाना भी बनाया और मठ को अपनी स्थापना के करीब 1000 साल के इतिहास के दौरान पहली बार इस तरह की विपदा का सामना करना पड़ा था। मराठों ने मठ की पूरी संपत्ति लूट ली थी। वहां रह रहे कई ब्राह्मणों को मा’र दिया था। यहां तक कि वहां स्थापित देवी शारदा की प्रतिमा को भी खंडित कर दिया था।

इस हमले के वक्त मठ के स्वामी किसी तरह जान बचाकर भाग निकले थे। बाद में उन्होंने टीपू सुल्तान को पत्र लिखकर उनसे मदद मांगी ताकि मठ और वहां के मंदिर में देवी की प्रतिमा को फिर स्थापित किया जा सके। इस पर टीपू ने बेहद नाराजगी के साथ संस्कृत में जवाबी पत्र भेजा। इसमें उन्होंने लिखा, ‘लोग गलत काम करके भी मुस्कुरा रहे हैं। लेकिन उनकी इस गुस्ताखी ने हमें जो पीड़ा पहुंचाई है, उन्हें इसकी सजा भुगतनी होगी।’ इसके साथ ही टीपू ने मठ के लिए माली मदद भी भेजी ताकि देवी की प्रतिमा वहां फिर स्थापित की जा सके। नई प्रतिमा के लिए उन्होंने अपनी तरफ से अलग से चढ़ावा भी भेजा।

मृत्यु

4 मई 1799 को 48 वर्ष की आयु में कर्नाटक के श्रीरंगपट्टना में टीपू को धोके से अंग्रेजों द्वारा क़त्ल किया गया। टीपू अपनी आखिरी साँस तक अंग्रेजो से लड़ते लड़ते शहीद हो गए। उनकी तलवार अंगरेज़ अपने साथ ब्रिटेन ले गए। टीपू की मृत्यू के बाद सारा राज्य अंग्रेज़ों के हाथ आ गया।

साभार: सत्यागृह 


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