अर्णब गोस्वामी केस में सुप्रीम कोर्ट ने रखा अपना फैसला सुरक्षित

रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी के मामले को लेकर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट ने अर्नब गोस्वामी द्वारा दायर एक याचिका में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। इस याचिका में अर्नब गोस्वामी द्वारा मुंबई पुलिस द्वारा बांद्रा में प्रवासियों के इकट्ठा होने की उनकी रिपोर्ट के जरिए सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए दर्ज की गई एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई है।

गोस्वामी की तरफ से अदालत में वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे उपस्थित हुए। हरीश साल्वे ने सुप्रीम कोर्ट की पीठ से बार-बार केस सीबीआई को स्थानांतरित करने के लिए कहा। जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और एमआर शाह की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एफआईआर पर फैसला सुनाने तक के लिए कठोर कार्रवाई से अंतरिम सुरक्षा प्रदान की।

Livelaw की रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई पुलिस की निष्पक्षता पर संदेह व्यक्त करते हुए हरीश साल्वे ने मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को हस्तांतरित करने की मांग की। इस दौरान उन्होंने जोर देकर कहा कि जांच उचित तरीके से नहीं चल रही है। कपिल सिब्बल ने शीर्ष अदालत से कहा, “वह (अर्नब गोस्वामी) शुद्ध सांप्रदायिक हिंसा में लिप्त हैं।” सिब्बल ने कहा, “इस सांप्रदायिक हिंसा को रोकें। शालीनता और नैतिकता का आपको (अर्नब गोस्वामी) पालन करने की आवश्यकता है। आप सनसनीखेज चीजों के माध्यम से लोगों को कलंकित कर रहे हैं।”

वहीं दूसरी और अर्नब गोस्वामी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर लंबित कार्यवाही शुरू करने की भी मांग की गई है। लाइव लॉ वेबसाइट के अनुसार, रिपेक खानसाल द्वारा दायर याचिका में कहा गया कि गोस्वामी ने उनके खिलाफ देश भर में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग सुप्रीम कोर्ट में दायर जिस रिट याचिका में की, उसमें उन्होंने भ्रामक बयान दिए हैं। आवेदक ने इस याचिका में गोस्वामी द्वारा किए गए दावों पर आपत्ति जताई है कि वह “एक पत्रकार और संपादक” हैं।

उन्होने याचिका में कहा, प्रसारण कर्मचारी और टीवी एंकर ” प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ बुक्स एक्ट 1867 ” के अनुसार “संपादक” की परिभाषा के दायरे में नहीं आते हैं और ‘वर्किंग जर्नलिस्ट’ के दायरे में भी काम करने वाले पत्रकारों और अन्य अखबारों के तहत हैं, जैसा कि कर्मचारी (सेवा की शर्तें) और विविध प्रावधान अधिनियम, 1955 में परिभाषित है।


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