नूरुल आलम एक ऐसा नाम जिसने बिना किसी क्रिकेट अकादमी के क्रिकेट की दुनिया में अपनी छाप छोड़ी है, नूरुल आलम असम

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नूरुल आलम असम के एक जिले नलबाड़ी के राज नगर में 1983 में जन्मे थे प्राथमिक शिक्षा के बाद उन्होंने 1991 में स्नातक की उपाधि प्राप्त कर नलबाड़ी कॉलेज में दाखिला लिया,

नूर आलम की खेल में विशेष रूचि होने के कारन उन्होंने क्रिकेट के मैदान में क़दम रखा और क्रिकेट की दुनिया में एक प्रतिभाशाली खिलाडी के रूप में लोग आलम को जानने लगे, एक समय था जब नूर आलम को नलबाड़ी जिले का स्टार क्रिकेटर माना जाता था पुरे राज्ये में आलम को एक उभरते क्रिकेटर के रूप में देखा जाने लगा,

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नलबाड़ी के खिलाडियों के लिए अब आर्थिक स्तिथ वैसी नहीं रही काफी संकट में है जबकि प्रमुख खेल आयोजक मनोज कुमार चौधरी इस कठिन समय के दौरान उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ा रहे हैं, उनके साथ निर्वाचन छेत्र के विधायक श्री जयंत मल्ला बरुआ जो वर्तमान में नलबाड़ी स्पोर्ट्स एसोसिएशन के कार्यालय सचिव भी हैं पूरा सहयोग दे रहे हैं,
नूर आलम अपने राज्य के सबसे चर्चित और शानदार खिलाडी होने के साथ साथ नयी पीढ़ी के क्रिकेटरो के लिए एक आदर्श भी हैं,

1968 में नूर आलम ने नवाब अली के संरक्षण में क्रिकेट के मूल गुण सीखने के साथ सबसे प्रतिभाशाली खिलाडी के रूप में अपनी पहचान बनाई, और फिर 1986 में नलबाड़ी में आयोजित इंटर-डिस्ट्रिक्ट आरजी बरुआ क्रिकेट टूर्नामेंट में aनलबाड़ी जिले का प्रतिनिधित्व भी किया और फिर नूर आलम सबको पीछे छोड़ते चले गए, इसी तरह उनकी एक अलग पहचान बनती चली गयी,

उसके बाद नूर ने इखान अंतर जिला क्रिकेट टूर्नामेंट जैसे कई टूर्नामेंट में भाग ले कर जिले न नाम रौशन करने में सफल रहे, और फिर उन्होंने 1989 में बारपेटा में आयोजित इंटर-डिस्ट्रिक्ट आरजी बरुआ क्रिकेट टूर्नामेंट में हिस्सा लिया और अपनी प्रतिभा पर खरे उतारते चले गए और इसके बाद आलम को जिले की टीम का कप्तान बनाया गया उन्होंने कई टूर्नामेंट में कप्तान की सफल भूमिका निभाई,

1990 में धुबरी में आयोजित अंतर-जिला आरजी बरुआ क्रिकेट टूर्नामेंट में नलबाड़ी जिले का प्रतिनिधित्व करते हुए शानदार क्रिकेट खेलते हुए दो अर्धशतक बनाये जबकि आलम को 108 रन बनाने वाला एक मात्र जूनियर खिलाडी माना जाता है,

1990 -1991 में असम क्रिकेट असोसिएसन द्वारा आयोजित कैंप में दो बार उन्हें भाग लेने के लिए चुना गया, उस समय रणजी ट्रॉफी, कोचबिहार ट्रॉफी और विजय मर्चेंट ट्रॉफी खेलने वाले सभी खिलाडी व दिग्गज वहां उपस्थित थे, कैंप में बतौर कोच क्रिकेटर एनआईएस प्रणब बरुआ और गौतम हजारिका भी उपस्थित थे, यह कैंप महीने भर चला इससे नूर आलम ने बहुत कुछ सीखा और रणजी ट्रॉफी के प्रबल दावेदार भी बन गए, लेकिन अंतिम समय में किन्ही कारणवश उनका चयन नहीं हो पाया यह उदासी नूर को आज भी सताती रहती है,

1994 से 1996 तक वह नलबाड़ी स्पोर्ट्स एसोसिएशन के फुटबॉल सचिव थे और 2003 से 2016 तक, वे सहायक संपादक की भमिका निभाते रहे हैं, इसके अलावा नूर खेल निकायों के क्रिकेट टूर्नामेंट के साथ साथ प्रदेश के कई जिलों में आयोजित क्रिकेट प्रतियोगिताओं में एक कुशल अंपायर की भूमिका निभाते रहे हैं।

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