प्रतिकूल परिस्थितियों में टकराव से बचते हुए धैर्य रखें मुसलमान: मस्जिदों के इमाम

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नमाज़-ए-जुमा से पहले देश की कई प्रमुख मस्जिदों के इमाम ने सब्र (धैर्य) की मौजूदा दौर में एहमीयत के विषय पर पर तक़रीर करते हुए कहा कि सबर एक ऐसी चीज़ है जिससे कामियाबी मिलती है। अल्लाह ताला सबर करने वालों का साथ देता है जो लोग सबर से काम लेते हैं उनके साथ अल्लाह ताला की मदद आती है और मुसलामानों की सामाजिक जीवन में भी सबर के अच्छे परिणाम सामने आते हैं। जब समाज पर कोई मुसीबत या बुरा वक़्त आ जाए तो इस का मुक़ाबला सिर्फ़ हिम्मत और सबर ही से किया जा सकता है।

अगर कभी संगीन हालात का सामना करना पड़ जाये तो उस समय अगर अफ़रातफ़री, अव्यवस्था, हताशा और बे अमली का मुज़ाहरा किया जाए तो समाज तबाही की तरफ पहुँच जायेगी। हमें चाहीए कि अगर कोई तकलीफ़ या मुसीबत आ पड़े तो अल्लाह की रज़ा की ख़ातिर सबर करें।

इमामों ने कहा कि सबर को नबियों के गुणों में गिना जाता है। हुज़ूर अकरम सल्ल्लाहू ताला अलैहि वसल्लम के सामने मक्का के लोगों ने बहुत रुकावटें खड़ी कीं।लेकिन हर मुश्किलात और तकलीफ़ को सबर से बर्दाश्त करते रहे।

नबी अकरम सल्ल्लाहू ताला अलैहि वसल्लम ने हमेशा टकराव से बचे। मक्का के मुखालिफ माहौल में हमेशा मक्का के लोगों के सामने नैतिकता की मिसाल पेश की। किसी ने गाली दी तो जवाब में उसे दुआ दी। किसी ने पत्थर फेंका तो आपने उस से नरमी से बात की। किसी ने दिल दुखाया तो आप उस के साथ हमदर्दी से पेश आये। कभी भी किसी के साथ लड़ाई झगडा नहीं किया। बल्कि सबर के साथ हिक्मत को अपनाया।

लोगों को लगातार भलाई और दुनिया व आखिरत की कामयाबी की तरफ़ बुलाते रहे। अल्लाह के पसंदीदा दीन की तरफ़ लोगों को राग़िब करते रहे और आपके सबर का ही नतीजा था कि आपकी दावत ने लोगों के दिलों को जीत लिया। कुछ सालों में जो लोग आपके दुश्मन थे वो आपकी गु़लामी में शामिल हो गए।

इमामों ने कहा कि सबर का समाज पर भी बहुत बड़ा असर पड़ता है क्योंकि सामाजिक ज़िंदगी में अगर कभी कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना पेश आ जाये, और ऐसे हालात में अगर सबर का दामन छोड़कर टकराव अपना लिया जाये तो पूरे समाज में अराजकता फैल जाएगी। और इस से शान्ति भंग हो जायेगी ।

कोई भी समाज जब तरक़्क़ी करता है तो उस के रास्ते में हज़ारों मुश्किलात आते हैं।दीन की राह में कोई निकलता है तो उस के सामने रुकावटें आ जाती हैं। ऐसे हालात में अगर इन मुश्किलात पर सबर ना किया जाये तो इन्सान तरक़्क़ी की राह पर नहीं चल सकता है । अगर मुश्किलात के वक़्त इन्सान सबर के बजाय होश खो बैठे तो उस की तरक़्क़ी रुक जाएगी ।

इमामों ने कहा कि नबी करीम सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम की ज़िंदगी से हमें ये सबक़ मिलता है कि अपनी बातों पर अटल रहते हुए संयम से लोगों को दीन के बारे में बताना चाहिए. अगर कोई दीन के खिलाफ बोलता है तो उस से टकराव नहीं करना चाहिए बल्कि उसे दलील के साथ जवाब देना चाहिए.

हमेशा सबर के अपने पड़ोसीयों, अह्ले वतन से चाहे वह किसी कभी ख़्याल और मज़हब के मानने वाले हों उनसे अख़लाक़ व मुहब्बत और भलाई का बरताव करना चाहीए।

क़ादरी मस्जिद शास्त्री पार्क दिल्ली के इमाम मुफ्ती अशफाक हुसैन क़ादरी, रतलाम के सुन्नी जामा मस्जिद के मुफ्ती बिलाल निजामी, हमीरपुर के मौलाना शाहिद मिस्बाही, मौलाना बदरुद्दीन मिसबाही खतीब व इमाम मस्जिदे आला हज़रत निज़ामिया लखनऊ, जयपुर के मौलाना सैयद मुहम्मद क़ादरी,अजमेर में मौलाना अंसार फैजी, कारी हनीफ मुरादाबाद, मौलाना सखी जम्मू, मौलाना मजहर इमाम (उत्तर दीनाज पर बंगाल), मौलाना अब्दुल जलील निजामी( पीलीभीत), मौलाना समीर अहमद (रामपुर), मौलाना कारी जमाल, भागलपुर में मौलाना अबरार, नागपुर में मौलाना मुस्तफा रज़ा और अमन शहीद जामा मस्जिद के मौलाना तनवीर अहमद और दिल्ली मुस्तफाबाद में मौलाना मुशर्रफ ने इसी मुद्दे पर खिताब किया।

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