एमएसओ के वेबीनार में बोले पूर्वी तुर्किस्तान के पीएम – चीन हमारी संस्कृति को नष्ट कर रहा

  • एमएसओ ने पूर्वी तुर्किस्तान पर बुलाया वेबीनार
  • तुर्किस्तान के उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का बयान
  • तुर्किस्तानी नेताओं ने कहा- पाकिस्तान भरम में, चीन हमारी भूमि और संस्कृति को नष्ट कर रहा है- अहद नूर

नई दिल्ली। हमारी ज़मीन पर चीन ने कब्जा करके इसका नाम बदल दिया है। हम पूर्वी तुर्किस्तान हैं। यह मध्य एशिया का देश है। कोई देश हमारी पीड़ा को देखकर बोलने को तैयार नहीं है। यह बात पूर्वी तुर्किस्तान की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री और फिलहाल अमेरिका में रह रहे सालेह ने कही। वह भारत के सबसे बड़े मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ इंडिया के एक वेबीनार में बोल रहे थे। सालेह के अलावा पूर्वी तुर्किस्तान के उपराष्ट्रपति नूर ने भी वेबीनार में भारतीय छात्रों को संबोधित किया। निर्वासित सरकार ने पाकिस्तान और तुर्की पर भी गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें भ्रमित देश की संज्ञा दी।

पूर्वी तुर्किस्तान की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री सालेह हुदियार ने कहाकि सन् 1934 सोवियत संघ ने हमारे देश पर कब्जा किया। हमने इनसे 1944 में हमने आज़ादी हासिल कर ली। इन चार सालों में हमने भारत और बिरतानिया से संबंध बनाए। चीन ने 1949 के दिसम्बर महीने में हमारे देश पर फिर कब्जा कर लिया गया। जिस दिन हमारे देश पर कब्जा किया गया हमारी जनजातीय आबादी 90 फीसदी मुस्लिम की थी। चीन ने अब तक 40 परमाणु परीक्षण किए हैं जिससे हमारी बहुत आबादी मारी गई है। इसके दुष्परिणाम भी आ रहे हैं। चीन ने 5 लाख बच्चों को बंधक बना कर रखा हुआ है। हमारी महिलाओं से जबरदस्ती शादियां की जाती हैं ताकि हमारा अस्तित्व समाप्त किया जा सके। अब तक 11 लाख चीनियों को हमारी भूमि पर बसाया गया है। वन बेल्ट वन रोड के ज़रिए चीन हमारे देश का अन्तरराष्ट्रीकरण करना चाहती है।

सालेह ने कहाकि सन् 1954 में पहले इसे स्वायत्त क्षेत्र बनाया गया। हमारी राजनीतिक शक्तियाँ छीन ली गईं। मुस्लिम देशों को चाहिए कि हमारी आवाज़ को मुस्लिम राष्ट्र संगठन यानी ओआईसी में उठाया जाना चाहिए। एक बार भी ऑर्गेनाइज़ेशन ने हमारी पीड़ा के पक्ष में कोई आवाज़ नहीं उठाई। आप तुर्किस्तान में सलाम भी नहीं कर सकते। चीन पर दबाव बनाए जाने की आवश्यकता है।

सालेह हुदियार ने कहाकि अभी तक हमारे लाखों लोगों के मारे जाने की सूचना है लेकिन इसका कोई आंकड़ा नहीं है। परमाणु परीक्षणों की वजह से हमारें बहुत लोग मारे गए हैं। लाखों महिलाओं के गर्भ गिरवाए गए ताकि हमारी आबादी को बढ़ने से रोका जा सके। अभी 30 लाख लोग कनस्ट्रेशन कैम्प में हैं। जेलों में लाखों लोग हैं। इनके साथ जेलों में बलात्कार होता है। चीनी खुफिया ने हमारे लोगों को तुर्की में मारा है। हमारे कई नेताओं को चीनी ख़ुफिया ने पाकिस्तान, मिस्र, ताजिकिस्तान और यूरोप में भी चीनी ख़ुफिया ने मारा है। वह हमारे लोगों को एक होने से रोकता है।

मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष शुजात अली क़ादरी के एक सवाल के जवाब में सालेह ने कहाकि चीन ने 1949 में जो खेल चीन ने तुर्किस्तान के साथ खेला था आज वह पाकिस्तान के साथ खेल रहा है। पाकिस्तानी जानते हैं कि उन्हें लाभ नहीं होगा लेकिन वह चुप हैं। तुर्की और मध्य एशिया के साथ हमारे सांस्कृतिक संबंध हैं लेकिन चीनी होशियारी की वजह से वह चुप हैं। 1955 में उन्होंने तुर्किस्तान के साथ संधि तोड़कर हमारे देश को स्वायत्तता छीन ली। जब हम आज़ाद थे चीन मूल के 5 प्रतिशत लोग थे आज यह संख्या 40 प्रतिशत है।  सीपैक के नाम पर 60 अरब डॉलर की मदद पाकिस्तान को दे रहे हैं लेकिन पाकिस्तान को 2 अरब डॉलर भी नहीं मिल रहे हैं। पाकिस्तानी चीन द्वारा मूर्ख बनाए जा रहे हैं। तुर्किस्तान का नाम तुर्की से ही आई है। तुर्की भी पाकिस्तान की तरह झांसे में है।

उन्होंने कहाकि विदेशों में बसे लोग हमारे लिए धन और राजनीतिक समर्थन की व्यवस्था करते हैं। भारत में भी हमारे मित्र लोग रहते हैं। तिब्बती लोगों की तरह हम अपने संघर्ष को आगे बढ़ा रहे हैं। पैगम्बर हज़रत मुहम्मद का संघर्ष हो या आप गांधीजी का संघर्ष देखेंगे तो शुरू में उनके पास कुछ नहीं था। हम खिलाफत के आधार पर आज़ादी का कोई सपना नहीं देखते। हमें लगता है कि मानवता और समानता के बल पर हम फिर से स्थापित हो सकेंगे। हम में से हर व्यक्ति राजनीतिक बंदी है। अगर यह कन्संट्रेशन कैम्प है, यह जेल ही है।

पूर्वी तुर्किस्तान यानी चीन के वर्तमान शिनजियांग की निर्वासित सरकार के उपराष्ट्रपति अब्दुल अहद नूर ने कहाकि चीन का ज़ुल्म बहुत भारी है। जबसे उन्होंने क़ब्ज़ा किया है, इस्लाम और मुस्लिम पर हमला किया जा रहा है। पहले उन्होंने राजनीतिज्ञों को मारा फिर धार्मिक नेताओं को। अब चीन सबको अपना निशाना बना रहा है। मेरे सभी रिश्तेदार या तो जेल में हैं या फिर कनसनट्रेशन कैम्प में हैं। जब 1999 में जब हम तुर्की में था, यह तभी हो गया था। अब चीन इस्लाम और आम तुर्किस्तानी मुस्लिमों के विरुद्ध खुलकर आ गया है। यह आतंक रोज़ाना की दर से बढ़ रहा है। चीनी सरकार ने मुसलमानों पर क़ुरआन रखने, पढ़ाने और इस्लामी नामों पर प्रतिबंध लगा रखा है।

युवा पीढ़ी का मस्तिष्क बदला जा रहा है। वहाँ उन्हें शी जिनपिंग की पूजा करना सिखाया जा रहा है। चीन की सरकार हमारी पहचान को समाप्त करना चाहती है। सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को समाप्त करना चाहती है। चीन की सरकार का लक्ष्य है कि वह नरसंहार के ज़रिए सभी पहचान को समाप्त कर सके। पूर्वी तुर्किस्तान चीन को सरकार नहीं मानते। चीन हमलावर है। हम चाहते है कि इस्लामी विश्व हमारे पक्ष में बोले मगर पूरा इस्लामी समाज चुप है। हम यहाँ 6 हज़ार सालों से रह रहे हैं।

उइगर जनजाति ने सन् 964 ईस्वीं में ही हमने इस्लाम को अपना लिया था। कशगर शहर इस्लामी संस्कृति के हिसाब से दूसरा बुख़ारा कहलाया जाता था। हम चीनी नहीं हैं। उन्होंने अवैध क़ब्ज़ा किया है।  बहुत भावुक होकर अब्दुल अहद नूर ने कहाकि तुर्किस्तानी मुसलमानों उर्फ उइगर जनजाति की मस्जिदों, क़ब्रिस्तानों पर क़ब्ज़ा कर लिया गया है। हमारी महिलाओं पर कम्यूनिस्ट पुरुषों से विवाह करने के लिए मजबूर किया जाता है। धार्मिक स्वतंत्रता समाप्त कर दी गई है। महिलाओं के इस्लामी सांस्कृतिक पोशाक पर भी प्रतिबंध है। घरों में नमाज़ पढ़ने पर प्रतिबंध है। हमारे बच्चों के नाम हम इस्लाम के हिसाब से नहीं रख सकते। हमारे घरों और मोहल्लों पर सीसीटीवी के हिसाब से नज़र रखा जाती है।

चीन का आधिकारिक बयान है कि इस्लाम में वैचारिक बुराई है। इसको समाप्त किया जाना चाहिए। इसीलिए उन्होंने हमारे शिक्षा के सिस्टम को नष्ट कर दिया है। चीनी शिक्षा के कारण हमारे लोग भी कम्यूनिस्ट हो रहे हैं और बहुत से तुर्किस्तानी बुद्धिजीवी भ्रमित हो रहे हैं। हमारे बुद्धिजीवी हमारे पक्ष से हट रहे हैं। तुर्किस्तान के लोग 99 प्रतिशत सुन्नी हनफ़ी हैं और इसलिए हमारे क्षेत्र में वहाबी प्रभाव नहीं है। चीन यह कोशिश कर रहा है कि क़ुरआन की नक़ली प्रति तैयार करना चाहते हैं। लेकिन हम जानते हैं कि वह सफल नहीं हो पाएंगे।

शुजात कादरी के एक सवाल के जवाब में नूर ने कहाकि पाकिस्तान हमारी आवाज़ नहीं उठाता। उन्होंने तुर्किस्तान में वहाबिज्म के प्रभाव से इनकार करते हुए कहाकि वह सूफ़ी सुन्नी हनफ़ी लोग हैं और वहाबिज़्म को नहीं मानते। तुर्किस्तान की निर्वासित सरकार ने मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन की समय देने और बात सुनने की प्रशंसा में एक ट्वीट भी किया।


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