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सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन, बावजूद कठेरिया ने दी AMU को सरकारी मदद रोकने की धमकी

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राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष रामशंकर कठेरिया ने मंगलवार को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) को धमकी दी कि अगर एएमयू ने साढ़े 22 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करने की आयोग की सिफारिश का अनुपालन नहीं किया तो वह संस्थान को मिलने वाली सरकारी मदद रुकवा देंगे।

एएमयू के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात के बाद उन्होने कहा, ‘अगर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अधिकारी एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान साबित करने के आयोग के लिखित सवाल का एक महीने के अंदर समुचित जवाब नहीं देते हैं, तो वह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से एएमयू को मिलने वाले सभी अनुदान रोकने को कहेंगे।

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ध्यान रहे साल 2005 में एएमयू ने एक अपील दायर की थी कि अल्पसंख्यक छात्रों के लिए 50 प्रतिशत का आरक्षण होना चाहिए, जिसका मामला अभी भी विचारधीन चल रहा है। साथ ही एएमयू को अल्पसंख्यक संस्था होने का दर्जा देने वाला आदेश विवादों में आने के बाद ये मामला भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

कोर्ट ने भी केन्द्र सरकार और एएमयू प्रशासन को सुनने के लिए एएमयू में यथा स्थिति बरकरार रखी हुई है। इसलिए जब तक कोर्ट कोई फैसला नहीं सुना देता है तब तक एएमयू में किसी भी तरह के नए आदेश को न तो लागू किया जा सकता है और न ही किसी पुराने फैसले को बदला जा सकता है।

बावजूद अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष रामशंकर कठेरिया और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित बीजेपी के कई नेता एएमयू पर दलित आरक्षण को लेकर फैसला लेने का दबाव डाल रहे है।

कठेरिया ने ये भी कहा कि आयोग ने अब फैसला किया है कि वह एएमयू के अल्पसंख्यक संस्थान के दावे के सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट में लम्बित केस में पक्षकार बनेगा। हालांकि अदालत की अवमानना के चलते उन्होने दाखिला प्रणाली में किसी भी तरह की छेड़छाड़ से इंकार कर दिया।

वहीं एएमयू के कुलपति प्रोफेसर तारिक मंसूर ने एजेंसी को बताया कि एएमयू संविधान के अनुच्छेद 30 के मुताबिक काम करता है, जिसमें धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान खोलने और उन्हें संचालित करने की इजाजत दी गयी है। साथ ही अनुच्छेद 15 (5) के तहत अल्पसंख्यक संस्थानों को अनुच्छेद 30 के अन्तर्गत संवैधानिक आरक्षण से छूट प्राप्त है।

कुलपति ने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने एएमयू प्रशासन से साफ तौर पर कहा है कि वह एएमयू संशोधन कानून-1981 के तहत अपना कामकाज जारी रखे। इस कानून के तहत एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा मिला हुआ है और जब तक अल्पसंख्यक दर्जे के मामले में अंतिम फैसला नहीं आ जाता तब तक वह इसके अन्तर्गत काम कर सकता है।

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