घाटी में 30 साल बाद निकलेगा मोहर्रम का जुलूस, प्रशासन ने दी अनुमति

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जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने घाटी में मुहर्रम के जुलूस की अनुमति देने का फैसला किया है, जिस पर तीस साल पहले प्रतिबंध लगा दिया गया था। प्रशासन ने कहा कि मुहर्रम-उल-हराम 1443 (हिजरी) पुरानी प्रथा के अनुसार मनाया जाएगा।

बता दें कि कश्मीर घाटी में आतं’कवाद से पहले पारंपरिक मुहर्रम का जुलूस लाल चौक से लेकर डलगेट इलाके समेत शहर के कई इलाकों से होकर गुजरता था, लेकिन 1990 से इस पर रोक लगा दी गई है।

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ऐसे में अब 30 साल बाद मुहर्रम के जुलूस की अनुमति देने पर शीर्ष शिया नेता आगा सैयद हादी ने प्रशासन से पूछा कि क्या निर्णय के पीछे कोई “बड़ी योजना” है। उन्होने कहा, अन्य धार्मिक समारोहों पर प्रतिबंध अभी भी लागू है, मुहर्रम के प्रति यह उदारता क्यों? क्या इसके पीछे कोई बड़ी योजना नहीं है? हालांकि, अगर कोई इसे किसी विशेष धर्म के प्रति सहानुभूति मानता है, तो यह खेदजनक से कम नहीं है।”

आगा सैयद आबिद हुसैन हुसैनी ने इसे घाटी के शिया और सुन्नियों को विभाजित करने की साजिश बताया। सैयद आबिद ने एक ट्वीट में कहा, “एकता इस बात में निहित है कि तीस वर्षों में सभी प्रतिबंधों के बावजूद, शिया-सुन्नी समन्वय के माध्यम से शोक जुलूस निकाले गए। आज भी हमें शिया-सुन्नी एकता और समुदाय की जरूरत है, जो इस्लाम के दुश्मनों की साजिशों को नाकाम कर देगा।”

हालांकि कश्मीर घाटी के प्रमुख शिया नेता और शिया एसोसिएशन के प्रमुख इमरान रजा अंसारी ने आदेश का स्वागत करते हुए घोषणा की कि उनकी पार्टी पिछले अभ्यास (आ’तंकवाद पूर्व अवधि) के अनुसार आशूरा के जुलूस का नेतृत्व करेगी। इमरान अंसारी दिवंगत मौलवी इफ्तिखार हुसैन अंसारी के बेटे हैं, जो जम्मू-कश्मीर के सबसे बड़े शिया नेताओं में से एक हैं।

इमरान ने एक अन्य ट्वीट में कहा, “हम ऑल जम्मू एंड कश्मीर शिया एसोसिएशन 3दशकों के अंतराल के बाद कश्मीर में मुहर्रम के जुलूस की अनुमति देने के सरकार के फैसले का स्वागत करते हैं। इंशाअल्लाह एजेके शिया एसोसिएशन इस साल जुलूस का नेतृत्व करेगा।”

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