निकाह हलाला, बहुपत्नी प्रथा पर प्रतिबंध के खिलाफ AIMPLB की SC में अर्जी

मुस्लिम समुदाय में प्रचलित बहुपत्नी प्रथा और ‘निकाह हलाला’ की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं में पक्षकार बनने के लिए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपने आवेदन में कहा है कि शीर्ष अदालत पहले ही 1997 में बहुपत्नी प्रथा और ‘निकाह हलाला’ के मुद्दे पर गौर कर चुका है और उसने इसे लेकर दायर याचिकाओं पर विचार करने से इंकार कर दिया था। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपने आवेदन में कहा है कि पर्सनल लॉ को किसी कानून या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा इन्हें बनाये जाने की वजह से वैधता नहीं मिलती है। इन कानूनों का मूल स्रोत उनके धर्मग्रंथ हैं।

आवेदन में कहा गया है कि मुस्लिम लॉ मूल रूप से पवित्र कुरान और हदीस (मोहम्मद साहब की शिक्षाओं) पर आधारित है। अत: यह संविधान के अनुच्छेद 13 में उल्लिखित ‘लागू कानून’ के भाव के दायरे में नहीं आता है। इसलिए इनकी वैधता का परीक्षण नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने 2 दिसंबर को मुस्लिम समुदाय में प्रचलित बहुविवाह प्रथा और हलाला के खिलाफ दाखिल याचिका पर जल्द सुनवाई से इनकार कर दिया था। चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अगुआई वाली बेंच ने कहा कि हम सर्दियों की छुट्टियों के बाद मामले को देखेंगे। ये मामला सुप्रीम कोर्ट की ओर से संविधान पीठ को भेज दिया गया है।

बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने इस मामले में कोर्ट से जल्द सुनवाई की मांग की थी। याचिका में हलाला और पॉलीगेमी (बहुविवाह) को रे*प जैसा अपराध घोषित करने की मांग की गई है, जबकि बहुविवाह को संगीन अपराध घोषित करने की मांग की गई है।


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