दुश्मनी भुलाकर तुर्की-भारत हुए एक, मिलकर करेंगे यह बड़ा काम

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उज्बेकिस्तान के समरकंद में SCO शिखर सम्मेलन के मौके पर तुर्की के राष्ट्रपति तैयप एर्दोगन के साथ द्विपक्षीय बैठक की. इस दौरान दोनों नेताओं ने विविध क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग को गहरा करने के तरीकों पर चर्चा की.

उज्बेकिस्तान के समरकंद में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन की मौजूदगी ने सबका ध्यान खींचा। दरअसल, एससीओ को पश्चिमी देश अपने खिलाफ बना एक संगठन मानते हैं। उसमें नाटो सदस्य तुर्की के राष्ट्रपति की मौजूदगी से पूरी दुनिया अचंभित रह गई। अब खुद राष्ट्रपति एर्दोगन ने अपने देश की मीडिया को बताया कि तुर्की एससीओ का सदस्य बनना चाहता है। इसी कारण वह बैठक में विशेष अतिथि के तौर पर शामिल हुए थे। बड़ी बात यह है कि इस बयान को जारी करने के बाद एर्दोगन अमेरिका की यात्रा पर रवाना हो गए। एससीओ को अमेरिका एक पश्चिम विरोधी संगठन के तौर पर देखता है, जिसमें उसके दो सबसे बड़े दुश्मन रूस और चीन एक साथ शामिल हैं। ऐसे में नाटो सदस्य तुर्की की एससीओ की सदस्यता के दावे का खुलासा होने पर अमेरिका भड़क सकता है।

एर्दोगन ने कहा कि इस कदम से इन देशों के साथ हमारे संबंध बहुत अलग स्थिति में आ जाएंगे। जब उनसे पूछा गया कि क्या उनका मतलब एससीओ की सदस्यता से है, तो उन्होंने कहा, “बेशक, यही लक्ष्य है। तुर्की वर्तमान में एससीओ का एक डॉयलाग पार्टनर है। एससीओ के सदस्य देशों में चीन, रूस, भारत, पाकिस्तान, ईरान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान शामिल हैं।

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एससीओ की बैठक में तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात ने सबसे ज्यादा लोगों का ध्यान खींचा। यह भारत और तुर्की के नेताओं के बीच एक अप्रत्याशित मुलाकात थी। दरअसल, 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही पीएम मोदी ने तु्र्की को नजरअंदाज किया है। मामला यह है कि तुर्की ने कश्मीर को लेकर हर मोर्चे पर पाकिस्तान का समर्थन किया है। इतना ही नहीं, उसने संयुक्त राष्ट्र में एक-दो बार नहीं, बल्कि कई बार भारत के खि’लाफ बयानबाजी करते हुए कश्मीर का मुद्दा उठाया। भारत ने इसका जवाब भी दिया, लेकिन तुर्की के ऊपर इसका कोई असर नहीं हुआ।

एससीओ का सदस्य बनने के लिए सभी देशों की सहमति जरूरी
तुर्की को एससीओ का सदस्य बनने के लिए सभी सदस्य देशों की सहमति की जरूरत है। वर्तमान के सदस्य देशों में भारत को छोड़कर लगभग सभी देश तुर्की का समर्थन कर सकते हैं। ऐसे में सदस्य बनने के लिए तुर्की को हर हाल में भारत की मंजूरी की जरूरत होगी। इसी कारण एर्दोगन ने पीएम मोदी से मुलाकात कर उन्हें मनाने की कोशिश की। लेकिन, अब भविष्य में ही पता चलेगा कि क्या भारत, तुर्की को एससीओ में शामिल होने को लेकर अपनी रजामंदी देता है कि नहीं।

पुतिन से भी मिले एर्दोगन, परमाणु संयंत्र विवाद पर की बात
एससीओ शिखर सम्मेलन में द्विपक्षीय चर्चा के बीच, एर्दोगन ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत की। उन्होंने कहा कि तुर्की और रूस दक्षिणी तुर्की के अक्कुयू में एक पर’माणु ऊर्जा संयंत्र के निर्माण पर विवाद को हल करने के लिए एक समझौते पर पहुंच चुके हैं।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, एर्दोगन ने कहा कि तुर्की ने आईसी इक्टास को परियोजना में बहाल कर दिया गया है। पिछले महीने, रूसी राज्य परमाणु ऊर्जा कंपनी रोसाटॉम, जो तुर्की में इस परियोजना चला रही है, ने आईसी इक्टास के साथ अपने अनुबंध को कई उल्लं’घनों के आ’रोप के बाद खत्म कर दिया था।

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