नेपाल का एक और भारत विरोधी कदम, अब हिंदी पर प्रतिबंध की कर रहा तैयारी

काठमांडू. नेपाल एक के बाद एक भारत विरोधी फैसले ले रहा है। वह अब हिंदी भाषा पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रहा है। बता दें कि इससे पहले वह भारत के साथ सीमा विवाद और नागरिकता को लेकर कड़े तेवर दिखा चुका है। हालांकि माना जा रहा है कि नेपाली सरकार के लिए हिंदी भाषा को बैन करना आसान नहीं होगा।

हिंदी भाषा के मुद्दे पर जनता समाजवादी पार्टी की सांसद और मधेशी नेता सरिता गिरी ने सदन के अंदर जोरदार विरोध जताते हुए कहा कि सरकार तराई और मधेशी क्षेत्र में कड़े विरोध को न्यौता दे रही है। उन्होंने ओली से पूछा कि क्या इसके लिए उन्हें चीन से निर्देश दिए गए हैं।

बता दें कि नेपाल के तराई क्षेत्र में रहने वाली ज्यादातर आबादी भारतीय भाषाओं का ही प्रयोग करती है। भारत की सीमा से सटे इन क्षेत्रों में रहने वालों की कुल संख्या 77,569 है। यानी ये नेपाल की लगभग 0.29 प्रतिशत आबादी है। हालांकि इसके बाद भी नेपाल के भीतरी हिस्सों में भी लोग बड़ी संख्या में हिंदी बोलते और समझते हैं।

नेपाल की फर्स्ट लैंग्वेज नेपाली है। इसे लगभग 44.64% आबादी बोलती है। दूसरे नंबर पर मैथिली भाषा बोली-समझी जाती है. ये 11.67% लोग बोलते हैं, वहीं भारत के यूपी और बिहार में बोली जाने वाली भाषा भोजपुरी भी यहां की लगभग 6 प्रतिशत आबादी की फर्स्ट लैंग्वेज है। यहां 10वें नंबर पर उर्दू बोली जाती है, जो लगभग हिंदी से मिलती-जुलती भाषा है। लगभग 2.61% लोग इसे बोलते हैं।

इससे पहले नेपाल ने नागरिकता को लेकर नया कानून बना दिया है। नेपाल में शादी करने वाली किसी भी विदेशी महिला को नागरिकता के लिए सात साल इंतजार करना होगा। भारत-नेपाल के बीच सदियों से रोटी-बेटी का रिश्ता है। वहीं नेपाल के भारतीय सीमा से लगे लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा जैसे रणनीतिक क्षेत्र पर दावा करते हुए इसे अपने नक्शे में दिखाया है। साथ ही इस नक्शे को कानूनी रूप से मंजूरी भी दे दी है।


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