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किम जोंग और ट्रंप की मुलाकात, संदेहों के बीच सफलता की कितनी उम्मीद?

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इस समय पूरी दुनिया के नज़रें किम जोंग और अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की कल होने वाली बातचीत कर टिकी है, और उसकी कामयाबी या नाकामी के बारे में तरह तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।

इस बातचीत के लिए अच्छा माहौल बनाते हुए किम जोंग-उन ने अपने दो परमाणु परीक्षण केंद्रों को खुद ही नष्ट कर दिया है। साथ ही उन्होंने तीन अमरीकी नागरिकों को भी रिहा कर दिया है।

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एक तरह से देखें तो जो उत्तर कोरिया पूरी दुनिया से बिलकुल अलग-थलग रहता था वह आज पूरी दुनिया की राजनीति का केंद्र बन गया है।

दूसरी तरफ़ अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के लिए यह मुलाक़ात पूरी दुनिया के सामने अपना एक और खुला प्रदर्शन करने का मौक़ा है।

ट्रम्प की पहचान और वार्ता पर संदेह के बादल

वो अपने विरोधियों को इस मुलाक़ात के ज़रिए यह बताना चाहते हैं कि ट्रंप कुछ सकारात्मक भी कर सकते हैं। अभी तक तो उनकी विदेश नीति सिर्फ़ तोड़-फोड़ की ही रही है। वो जी-7 सम्मेलन में गए, वहां उन्होंने बातचीत ख़त्म कर दी। उन्होंने पेरिस जलवायु समझौते से खुद को बाहर कर लिया, नेटो को भी कमज़ोर कर दिया। ईरान के साथ होने वाले परमाणु समझौते के एकतफा रूप से अपने देश को बाहर निकाल लिया।

एक तरह से देखें तो ट्रंप की विदेश नीति अभी तक वैश्विक संवाद और नियमों को ख़त्म करने वाली ही रही है।

ट्रम्प की अंतरराष्ट्रीय पहचान को देखते हुए यह संदेह पैदा होता है कि कहीं ट्रंप और किम की ये मुलाक़ात वैसा ही मौक़ा हो सकता है जैसा 1970 में हुआ था, जब अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन चीन गए थे तो पूरी की पूरी अंतरराष्ट्रीय राजनीति उलट गई थी।

निक्सन के चीन जाने से पहले अमेरिका ताइवान को ही चीन समझता था, लेकिन उनकी यात्रा के बाद इसमें बदलाव आया। वहीं चीन और सोवियत संघ के बीच जो गठजोड़ बन रहा था, उन्होंने उसे भी तोड़ दिया था।

उत्तर कोरिया के प्रश्न

गंभीर चिंतक और विश्लेषक अमरीका की तरफ़ से यही दो महत्वपूर्ण सवाल पूछ रहे हैं, एक तो यह कि उत्तर कोरिया चीन पर काफी निर्भर है, क्या अमरीका उत्तर कोरिया को चीन से अलग कर पाएगा और दूसरा ये कि क्या वह उत्तर और दक्षिण कोरिया को एकजुट कर पाएगा।

अगर ऐसा होता है तो अमरीका की सेना बिलकुल चीन की सीमा तक पहुंच जाएगी। दूसरी बात यह है कि अगर उत्तर कोरिया परमाणु निरस्त्रीकरण की तरफ़ बढ़ जाता है तो पूरे इलाक़े में अमरीका के लिए यह बहुत बड़ी जीत होगी। वहीं उत्तर कोरिया की तरफ़ से यह चिंता रहेगी कि क्या इस मुलाक़ात के बाद अमरीका उत्तर कोरिया पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाएगा। साथ ही दक्षिण कोरिया में अमरीका की जो सैन्य टुकड़ियां मौजूद हैं वो वहां से बाहर चली जाएंगी।

उत्तर कोरिया के लिए यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है, और हाल के समय में अमरीका का जो व्यवहार रहा है उसके देखते हुए इस पर सदेह करना बनता है। क्योंकि अब तक अमरीका ने बहुत से अंतरराष्ट्रीय समझौते तोड़े हैं, जिसका हालिया नमूना ईरान के साथ हुआ परमाणु समझौता है, जिसे न केवल अमरीका ने तोड़ दिया बल्कि ईरान पर दोबारा प्रतिबंध भी लगा दिए हैं।

अब उत्तर कोरिया के लिए यह प्रश्न है कि वह क्या वादों को तोड़ने में माहिर अमरीका पर विश्वास कर सकता है? कही ऐसा न हो कि वह अपना परमाणु कार्यक्रम भी खो दें और बदले में उन्हें जुमले के अतिरिक्त और कुछ न मिले?

उल्लेखनीय है कि ट्रम्प द्वारा अमरीका को ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से निकाले जाने के बाद विश्व स्तर पर अमरीका पर भरोसा कम हुआ है, और किम जोंग भी वार्ता के समय अमरीका के इस व्यवहार पर ज़रूर ध्यान रखेंगे।

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