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नेपाल में पीएम मोदी की यात्रा का विरोध, अनशन पर बैठे त्रिभुवन युनिवर्सिटी के छात्र

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार से दो दिन के नेपाल के दौरे पर हैं. मोदी का ये दौरा कुटनीतिक कम और धार्मिक ज्यादा बताया जा रहा है. दरअसल, इस दौरे पर प्रधानमंत्री जानकी मंदिर से लेकर मुक्तिनाथ मंदिर और पशुपतिनाथ मंदिर भी जाएंगे. साथ ही रामायण सर्किट प्रोजेक्ट पर भी बातचीत होगी.

वहीँ दूसरी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेपाल में विरोध देखने को मिल रहा है. जनकपुर पहुंचे मोदी का सोशल मीडिया समेत कई डिजिटल मंचों पर दो साल पहले हुई आर्थिक नाकेबंदी से पैदा हुए गुस्‍से के जरिए स्‍वागत किया.

वहीँ त्रिभुवन युनिवर्सिटी के छात्रों ने भारत के प्रधानमंत्री के आगमन पर विरोधस्‍वरूप दो दिन का अनशन शुरू कर दिया है. यह अनशन मोदी की वापसी तक जारी रहेगा. वरिष्‍ठ पत्रकार और नेपाल विशेषज्ञ आनंद स्‍वरूप वर्मा ने आर्थिक नाकाबंदी की याद दिलाई है.


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उन्होंने फेसबुक पर एक लंबी टिप्‍पणी लिखी है जिसमें बताया गया है कि आखिर नेपालवासी मोदी को आर्थिक नाकाबंदी का दोषी क्‍यों मानते हैं और इतने दिन बाद भी वे उन त्रासद दिनों को क्‍यों नहीं भुला पा रहे हैं. नीचे वह टिप्‍पणी पढ़ें.

उन्होंने लिखा ”प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा के जो अनेक मकसद हैं उनमें एक प्रमुख है तराई और पहाड़ी क्षेत्र की जनता के बीच पहले से चले आ रहे अंतर्विरोध को और तीव्र करना तथा इस अंतर्विरोध का अपने हित में इस्तेमाल करना। 2019 में लोकसभा के चुनाव होने हैं और ऐसे में तराई की जनता के बीच अपनी लोकप्रियता का प्रदर्शन कर वह सीमा क्षेत्र से लगे उत्तर प्रदेश और बिहार के मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं। भारतीय मीडिया से यह प्रचारित किया जा रहा है कि मोदी का नेपाल में भव्य स्वागत हो रहा है जबकि सच्चाई यह है कि सितंबर 2015 में भारत ने जो आर्थिक नाकाबंदी की थी उसकी वजह से ‘मोदी गो बैक’ और ‘मोदी माफी मांगो’ के नारे और पोस्टर जगह-जगह दिखाई दे रहे हैं जिन्हें भारतीय मीडिया नहीं दिखाएगा लेकिन सोशल मीडिया और बीबीसी के जरिए लोगों तक यह जानकारी पहुंच चुकी है। त्रिभुवन विश्वविद्यालय में छात्रों का एक समूह आज सुबह से ही मोदी की यात्रा के विरोध में धरने पर बैठा है। जहां तक नाकाबंदी का सवाल है, इसके बारे में यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि यह नाकाबंदी भारत ने नहीं बल्कि मधेशी जनता ने की थी जो नए संविधान में अपनी उपेक्षा से नाराज थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि मधेश की जनता ने नए संविधान का लगभग बहिष्कार किया था और 20 सितंबर 2015 को जब संविधान जारी हो रहा था, वह संविधान के प्रति अपनी नाराजगी प्रकट कर रही थी। कुछ मधेशी नेताओं ने खुलकर यह बात कही थी कि यह संविधान उनके लिए नहीं है। इन सबके बावजूद नाकाबंदी जैसा कदम उसने नहीं उठाया था।

भारत सरकार ने भी संविधान के प्रति अपनी उपेक्षा का प्रदर्शन किया था क्योंकि 18 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशेष दूत के रूप में विदेश सचिव एस. जयशंकर की कोशिशों के बावजूद नेपाल की तीनों राजनीतिक पार्टियों के अध्यक्षों ने संविधान जारी करने पर अपनी सहमति जताई और इसे जारी किया। भारत सरकार की नाराजगी इस बात पर थी कि संविधान से ‘हिंदू राष्ट्र’ शब्द हटा दिया गया है। अपनी इस आपत्ति को सुषमा स्वराज और भगत सिंह कोश्यिारी ने नेपाल के राजनेताओं से व्यक्त किया था। यह जानकारी काठमांडो से प्रकाशित दैनिक पत्र ‘नया पत्रिका’ में छपे कोश्यिारी के इंटरव्यू से मिलती है।

अब संक्षेप में जरा नाकाबंदी से जुड़े घटनाक्रम को देख लें। 20 सितंबर की शाम को नेपाल का संविधान जारी हुआ। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने इसका स्वागत नहीं किया बल्कि इस अवसर पर जारी विज्ञप्ति में लिखा कि ‘‘वी नोट दि प्रामुलगेशन इन नेपाल टुडे ऑफ ए कांस्टीट्यूशन।’’

21 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी के बुलावे पर नेपाल स्थित भारतीय राजदूत रंजीत रे दिल्ली पहुंचे। रात में दिल्ली से भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की एक और विज्ञप्ति जारी हुई जिसकी भाषा काफी सख्त थी और जिसमें तराई में हो रही हिंसा पर नेपाल सरकार को फटकार लगाई गई थी। इस विज्ञप्ति में यह भी कहा गया था कि भारत से नेपाल सामान ले जाने वाले ट्रकों के सामने तराई क्षेत्र की हिंसा को लेकर दिक्कत पैदा हो रही है।

21 सितंबर की रात में ही सभी चेक पोस्टों (नाकों) पर भारतीय सुरक्षा अधिकारियों ने ट्रकों तथा अन्य वाहनों को रोक दिया। ट्रक चालकों से कहा गया कि वे अपने मालिकों से ‘नो आब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ लाएं कि अगर उनके ट्रकों को नेपाल की सीमा के अंदर कोई क्षति पहुंचती है तो इसकी जिम्मेदारी उनकी होगी। विज्ञप्ति से साफ पता चलता है कि सीमा पर कोई अवरोध नहीं था – जो भी दिक्कत थी वह सीमा के अंदर थी। इससे जाहिर होता है कि किसी भी मधेशी गुट ने सीमा पर कोई धरना प्रदर्शन नहीं किया था। देखते-देखते ट्रकों की मीलों लंबी लाइन लग गई। रात में ही सोशल मीडिया पर और अगले दिन अखबारों में यह खबर प्रकाशित हो गई कि भारत ने नेपाल के विरुद्ध आर्थिक नाकेबंदी कर दी है। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित मुख्य समाचार के अनुसार भारत सरकार ने संविधान में शामिल करने के लिए नेपाल सरकार के पास कुछ प्रस्ताव रखे। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भर्त्सना होते देख भारत सरकार ने इसका खंडन किया।

नाकाबंदी लागू होने के अगले दिन यानी 22 सितंबर को तराई के शहर राजविराज में मधेश केंद्रित पार्टियों के नेताओं की बैठक हुई और इसका विवरण काठमांडो से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक ‘हिमालयन टाइम्स’ में छपा। समाचार का शीर्षक था ‘मधेशी फ्रंट होल्ड्स मीटिंग इन राजविराज’। इस बैठक में उपेंद्र यादव, महंत ठाकुर, राजेंद्र महतो, महेंद्र राय यादव, हृदयेश त्रिपाठी जैसे नेताओं ने भाग लिया। बैठक में आंदोलन की रूपरेखा तय की गई। इसके बाद अगले दिन से बीरगंज-रक्सौल नाका पर धरना शुरू हो गया। अब भारत सरकार ने कहना शुरू किया कि नाकों पर धरने की वजह से सामान अंदर नहीं जा पा रहा है। जबकि यह धरना 22 सितंबर के बाद शुरू हुआ और नाकाबंदी 21 सितंबर की रात में ही कर दी गई थी।

इसके कुछ महीने बाद 16 नवंबर, 2015 को नेपाल के पूर्व राष्ट्रपति रामबरन यादव के प्रेस सलाहकार राजेंद्र दहाल ने राज्यसभा टीवी पर एक चर्चा के दौरान कहा कि केवल बीरगंज-रक्सौल नाका पर आंदोलनकारियों का धरना है। उन्होंने सवाल किया कि अन्य सभी 8-9 नाके खुले हुए हैं तो भी सामान क्यों नहीं आ रहा है। संकेतों में उन्होंने बता दिया कि मधेशी जनता द्वारा नहीं बल्कि भारत सरकार द्वारा नाकाबंदी की गई।

दरअसल मधेशी जनता के असंतोष की आड़ में भारत का मौजूदा शासन तंत्र नेपाल की बांह मरोड़ने में लगा रहा। यही वजह है कि आर्थिक नाकाबंदी की वजह से नेपाली जनता को जिन तकलीफों का सामना करना पड़ा, उसके लिए वह मोदी सरकार को माफ नहीं कर पा रही है।”