Home विचार आखिर भीड़ का शिकार आलोचक, अल्पसंख्यक और दलित ही क्यों ?

आखिर भीड़ का शिकार आलोचक, अल्पसंख्यक और दलित ही क्यों ?

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सत्येन्द्र सार्थक

मध्यकालीन इतिहास में दी जाने वाली बर्बर सजाएं मनुष्यता के अशिक्षित और सांस्कृतिक तौर पर पिछड़े होने की परिचायक मानी जाती हैं। लेकिन 21वीं सदी में जबकि हमने शिक्षा-संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान, कला-साहित्य के क्षेत्र में असाधारण उपलब्धियां हासिल कर ली हैं, समाज का एक तबका बर्बर उन्मादी भीड़ में तब्दील होता जा रहा है। यह भीड़ किसी नियम कानून को नहीं मानती, अफवाह की शिकार यह भीड़ खुद ही आरोप लगाकर बिना किसी सुनवाई के बर्बरता के साथ बेगुनाहों की हत्या कर रही है। 2014 के बाद भीड़ द्वारा हमलों की संख्या में गुणात्मक वृद्धि दर्ज की गई है। प्रधानमंत्री के समर्थक होने के बावजूद सोशल मीडिया पर भद्दी गालियां और महिलाओं को रेप की धमकी देने वाली आभासी भीड़ को नजरअंदाज कर दिया जाए, तो गौरक्षा के नाम पर भीड़ द्वारा किए गए 86 हमलों में 33 की मौत और 158 लोग गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं, वहीं बच्चा चोरी के आरोप में 2017 से 7 जुलाई 2018 तक 69 हमलों में 33 की मौत और 99 लोग गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं। सरकार की निष्क्रियता को देखते हुए हमलों में वृद्धि की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। साथ ही इस सवाल पर भी गौर करें कि आखिर इस भीड़ का शिकार सरकार के आलोचक, अल्पसंख्यक और दलित ही क्यों हो रहे हैं।

बीती 18 जुलाई को ऐसी ही भीड़ का शिकार बने 78 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश। हमला करने वाली भीड़ में भारतीय जनता युवा मोर्चा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य बड़ी संख्या में शामिल थे। जाहिर है यह भीड़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वैचारिक प्रतिनिधित्व कर रही थी। भीड़ ने स्वामी अग्निवेश को भद्दी-भद्दी गालियां देते हुए उन्हें लात-घूसों से मारा, जमीन पर गिराकर उनके कपड़े फाड़ दिए और जय श्रीराम का नारा लगाकर धमकी देते हुए आराम से चले गए। भीड़ में शामिल लोगों ने हाथों में काले कपड़े ले रखे थे ताकि यह तर्क दिया जा सके कि मारपीट का इरादा नहीं था, हालांकि घटना के वीडिया से जो तथ्य सामने आ चुके हैं वह ऐसे किसी तर्क की गुंजाइश ही नहीं छोड़ते। लगभग इसी समय सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जजों ने माॅब लिंचिंग पर केन्द्र व राज्य सरकारों को फटकार लगाते हुए कहा कि “लोकतंत्र की जगह भीड़तंत्र नहीं ले सकता, माॅब लिंचिंग की घटनाओं को रोकने के लिए सरकार अलग से कानून बनाए। किसी भी नागरिक का दोष भीड़ नहीं तय कर सकती, यह काम कानून का है।” कानून बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को एक महीने का समय दिया है।
सुप्रीम कोर्ट को इतने कड़े शब्दों का इस्तेमाल क्यों करना पड़ा, यह जानने के लिए हमें सरकार के रवैये पर गौर करना पड़ेगा। “सबका साथ, सबका विकास” के नारे के साथ सत्ता में आई भाजपा सरकार माॅब लिंचिंग की “कड़ी निंदा” करने के अलावा कितनी गंभीर है यह केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर के बयान से जाहिर हो जाता है, वह बताते हैं कि, “राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के पास माॅब लिंचिंग से जुड़ा कोई आंकड़ा नहीं हैं।” ऐसे रवैये से सरकार भीड़ का हिस्सा बनकर हत्या करने वालों को क्या मौन स्वीकृति नहीं दे रही? इतना शायद काफी नहीं था, इसीलिए सरकार के मंत्री और विधायक न केवल हत्यारोपियों के पक्ष में बयान दे रहे हैं बल्कि उनको नौकरी दिलाकर, “न्याय” मिलने का भरोसा देकर और उनका माल्यार्पण कर सम्मानित करके उनके हौसले बुलंद कर रहे हैं। यह अवसरवादी राजनीति किस हद तक गिर चुकी है इसे दादरी की घटना से समझा जा सकता है। 2015 में अखलाक के घर में घुसकर उसकी हत्या करने वाली भीड़ में शामिल मुख्य 15 आरोपियों को भाजपा विधायक के सहयोग से एनटीपीसी में संविदा पर नौकरी, बीमारी के कारण जेल में मर गए एक अन्य आरोपी रवि सिसौदिया के परिजनों को 8 लाख रुपए और पत्नी को टीचर की नौकरी दिलाने का इंतजाम कर दिया गया। इतना ही नहीं उसे शहीद बताकर अंतिम संस्कार के समय उसे तिरंगे में लपेटा गया था, कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि इस दौरान केन्द्रीय मंत्री सहित बड़ी संख्या में सरकारी अमला मौजूद था। भाजपा मंत्रियों की भीड़तंत्र के प्रति निष्ठा यहीं तक सीमित नहीं है केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने सजा पा चुके आरोपितों के जमानत पर छूटने के बाद उन्हें घर बुलाकर मुंह मीठा कराया और माला पहनाकर सम्मानित भी किया। एक ही पार्टी के अलग-अलग नेताओं का यह व्यवहार अकारण नहीं है यह भीड़तंत्र में यकीन रखने वालों के लिए संदेश है “तुम गलत नहीं हो इसलिए चिंता मत करो।”
पूरे देश के अलग-अलग राज्यों में भीड़ के न्याय पर भरोसा करने वाली भीड़ अचानक अचानक अस्तित्व में कैसे आ गई यह एक अलग सवाल है लेकिन 2014 से पहले ऐसी घटनाएं बिरले ही सुनने को मिलती थीं। इंडियास्पेंड के आंकड़ों के अनुसार 2014 के बाद ऐसी घटनाओं की बाढ़ सी आ गई है। पिछले 4 सालों में गोरक्षक भीड़ द्वारा 86 घटनाओं को अंजाम दिया जा चुका है जिसमें 33 लोगों की मौत हो चुकी है और 158 लोग गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं, इसके अलावा 81 लोगों को हल्की चोटें आई हैं। पीड़ितों में सबसे अधिक 56 प्रतिशत 112 लोग मुस्लिम और 20 प्रतिशत अज्ञात हैं जबकि 11 प्रतिशत दलित हैं। पूरे देश में गोरक्षा के नाम पर किए गए यह हमले सबसे अधिक 54 प्रतिशत भाजपा शासित राज्यों में हुए हैं जबकि बच्चा चोरी के अफवाह के नाम पर भीड़ द्वारा किए जा रहे हमले 2017 के बाद से तेजी से उभरे हैं। जनवरी 2017 से 5 जुलाई 2018 तक देश के अलग-अलग राज्यों में बच्चा चोरी की अफवाह के आधार पर भीड़तंत्र द्वारा हमले की 69 घटनाएं हो चुकी हैं, जिसमें 33 लोगों को जान गंवानी पड़ी और 99 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। ऐसा नहीं है कि बच्चा चोरी की बढ़ती घटनाएं इन हमलों की वजह थीं। सोशल मीडिया पर झूठे मैसेज वायरल करके सचेतन तौर पर लोगों को डराया गया। बच्चे चोरी होने के अफवाह के आधार पर भीड़ द्वारा सबसे अधिक हमले उड़ीसा में 15 और तमिलनाडु में 12 हुए हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि बच्चे चोरी होने के सर्वाधिक घटनाओं वाले राज्यों की सूची में उड़ीसा को 13 व तमिलनाडु को 18वां स्थान पर हैं। माॅब लिंचिंग की 80 फीसदी घटनाओं का आधार केवल सोशल मीडिया पर वायरल हो रही झूठी खबरें हैं, चाहे वह बच्चा चोरी की हों या गोकशी की।
किसके कंधों पर टिका है भीड़तंत्र?
हमले चाहे गोकशी के आरोप में किए जा रहे हों या बच्चा चोरी के आरोप में, लगभग सभी घटनाओं में भीड़ द्वारा किए गए हमलों में कुछ समानताएं हैं। बहुत ही सुनियोजित तरीके से सोशल मीडिया के जरिए और मुंहामुंही अफवाह फैलाई जाती हैं। अफवाह से ही एक निश्चित जगह पर भीड़ को एकत्रित किया जाता है और फिर झूठे आरोपों के आधार पर व्यक्ति पर हमला कर दिया जाता है उसे कुछ बोलने तक का मौका नहीं दिया जाता है। सवाल उठता है कि यह भीड़ कहां से आती है? माॅब लिंचिंग करने वाली भीड़ निम्नमध्यवर्गीय परिवारों के युवाओं की है। देश में बढ़ती बेरोजगारी और मुफ्त डाटा के कारण सोशल मीडिया पर उनका पर्याप्त समय बीतता है। भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से जारी कलेम्स इंडिया डेटाबेस के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2013-14 में देश में कुल रोजगार 48.38 करोड़ थे। केवल दो सालों में इनमें 11.53 लाख रोजगार कम हो गए। नोटबंदी ने तो असंगठित क्षेत्र को पूरी तरह से झकझोर दिया, जीएसटी ने रही सही कसर पूरी कर दी जिससे असंगठित क्षेत्र अभी तक उबर नहीं पाया है। यानि बेरोजगारों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है। यही वह तबका है जो अफवाहों को तेजी से वायरल होने में मदद पहुंचाता है। भविष्य के प्रति अनिश्चित और दुविधाग्रस्त निम्नमध्यवर्ग युवाओं का यही तबका धार्मिक और जातिगत मसलों पर सर्वाधिक प्रतिक्रियावादी रुख अपना रहा है। जीवन के प्रति नाउम्मीद इन युवाओं को सोशल मीडिया के मैसेज एक काल्पनिक शत्रु का अहसास कराते हैं और यह अपना सारा गुस्सा काल्पनिक शत्रु पर ही झोंक देता है।
क्या भीड़तंत्र सत्ता की जरूरत है?
मोदी सरकार ने सत्ता में आने के लिए बहुत लंबे-चौड़े वादे किए थे। विदेश में जमा कालाधन देश में लाकर सभी के खाते में 15 लाख रुपए जमा करने और हर साल 2 करोड़ नौकरियां देेने के वादे को अगर हम जुमला मान भी लें तो भी ऐसे सैकड़ों वादे हैं जिनसे जनता को नाउम्मीदी ही हासिल हुई है जैसे महंगाई कम करने, गरीब-अमीर के बीच की खाई कम करने, भ्रष्टाचार का नाश करने, डाॅलर के मुकाबले रुपए को मजबूत करने, किसानों की आय दुगनी करने, महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण और सामाजिक सुरक्षा देने, पाकिस्तान और चीन को सबक सिखाने, गंगा को साफ करने, स्मार्ट सिटी बनाने, गुणवत्तापरक शिक्षा देने और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के वादे। जनता इन वादों के झांसे में आ गई और मोदी सरकार को प्रचंड बहुमत दिया। इसके बावजूद वादे तो पूरे हुए नहीं उल्टे सरकार ने नोटबंदी, जीएसटी के जरिए देश की जनता की हालत खराब कर दी। लोग अपने ही पैसों के लिए रोते बिलखते लाइन में घंटों खड़े होने पर मजबूर हो गए, सौ से अधिक लोगों की मौत हो गई। भ्रष्टाचार तो रुका नहीं उल्टे ललित मोदी, नीरव मोदी, विजय माल्या जैसे लोग लाखों करोड़ों लेकर देश ही छोड़कर भाग गए। जीएसटी ने महंगाई की समस्या को बेलगाम कर दिया। छोटे दुकानदार, सीए और वकील के आफिसों के चक्कर काटने लगे और “कड़ी कार्यवाही” का खौफ इतना कि छोटे-छोटे किराना व्यापारियों तक ने जीएसटीएन पर पंजीकरण करवा लिया। यानि जनता का भाजपा सरकार के प्रति तेजी से मोहभंग होेने लगा। लोग सरकार को उसके वादे याद दिलाएं ऐसा भी नहीं हो सका। सहिष्णुता बनाम असहिष्णुता, गोरक्षा, तीन तलाक, रोहिंग्या मुस्लिम, लव जेहाद और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दों से जबतक लोगों का ध्यान हटता भीड़तंत्र हावी हो चुका था। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक भीड़तंत्र के हमलों ने एक ऐसे खौफ के माहौल का निर्माण किया कि जीवन की बुनियादी जरूरतों पर जिंदा रहने की चिंता हावी हो गई। भीड़तंत्र ने असहमति और विरोध के स्वरों को घर के अंदर ही सीमित करने में बड़ी भूमिका अदा की। साथ ही सरकार को यह मौका भी दे दिया कि वह पुराने और अधूरे प्रोजेक्ट्स के फीते काटकर अगामी चुनावों के लिए फिर से वादे कर सके।
(ये लेखक के निजी विचार है)
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