Home विचार एर्दोगान की जीत पर भारतीय संघियों में बेचैनी क्यों ?

एर्दोगान की जीत पर भारतीय संघियों में बेचैनी क्यों ?

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तारिक अनवर चंपारणी 

एर्दोगान की जीत पर पश्चिमी देशों सहित भारतीय संघियों में भी बेचैनी है। “द वायर” नामक कांग्रेसी पोर्टल पर एक नौसीखिया पत्रकार है जो स्वयं को अम्बेडकरवादी एवं दलितवादी बोलता है। वह एर्दोगान की तुलना मोदी से कर रहा है। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि वह अम्बेडकरवादी पत्रकार इतना बेचैन क्यों है? मुझें यह समझ नहीं आ रहा है कि वह लिखा-पढा पत्रकार है या पढ़ा-लिखा?

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हिंदी साहित्य की चार किताबें पढ़ कर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की ज्ञान का दम्भ भरने वाले उस पत्रकार को कभी बर्मा के रिफ्यूजी कैम्प, कभी सीरिया के रिफ्यूज कैम्प और दुनिया भर से तुर्की में पनाह लिये रिफ्यूजी की जीवन का सोशल ऑडिट कर लेना चाहिए। तुम राजनीतिक मुद्दों को छोड़कर मामा-भांजी एवं चाचा-भतीजी के बीच के सम्बन्धों पर रिपोर्टिंग शुरू करो। बहुत ट्रैफिक मिलेगा।

एर्दोगान डेमोक्रेटिक प्रोसेस से चुने गये राष्ट्रपति है। इसलिए, डेमोक्रेसी में विश्वास रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को एर्दोगान की जीत पर खुशी मनाने का हक़ है। बेशक़, मोदी भी डेमोक्रेटिक प्रोसेस से चुनकर आये है। लेकिन, मोदी और एर्दोगान की बराबरी करना बेवक़ूफ़ी है। मोदी की समीक्षा भारतीय डेमोक्रेटिक सेटअप के अनुसार करना पड़ेगा जबकि एर्दोगान की समीक्षा तुर्कीश डेमोक्रेटिक सेटअप के आधार पर करना पड़ेगा।

मोदी सिर्फ इसलिए डेमोक्रेटिक नहीं हो सकता कि उसकों पश्चिमी देशों का समर्थन हासिल है और एर्दोगान सिर्फ इसलिए तानाशाह नहीं हो सकता कि उसको पश्चिमी देशों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

बाकी, हम भारतीय मुसलमानों की खुशी एर्दोगान को लेकर इस बात के लिए बिल्कुल भी नहीं है कि तुर्की में मुस्तफा कमाल पाशा की विचारों को पराजित कर के ख़िलाफ़त लागू करने जा रहे है बल्कि हम भारतीयों के खुशी का कारण यह है कि जब बर्मा में बौद्धिस्टों द्वारा रोहिंग्यान मुसलमानों को कुचला जा रहा था तब भारत उन शरणार्थियों को आतंकवादी साबित करने पर तुला था और एर्दोगान अपनी पत्नि के साथ बर्मा में राहत-सामग्री बाँट रहे थे।

एर्दोगान की जीत पर हम भारतीय मुसलमान इसलिए खुश नहीं है कि तुर्की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में कोई बहुत बड़ा डेवलोपमेन्ट लाने जा रहे है बल्कि हम खुश इसलिए है कि जब अफ्रीका और दूसरे देशों से लोग शरणस्थल ढूंढ़ रहे थे तब इंसानियत की मिसाल पेश करते हुए तुर्की में शरण देने का काम किया। वादा करके भी काश्मीरी पंडितों को काश्मीर में वापस शरण नहीं दिलाने वाले मोदी से एर्दोगान की बराबरी करने में कुढ़मग़ज़ों को बन्द हो चुके अपने थिंकिंग वॉल्व को फिर से खोल लेना चाहिये।

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