Home विचार तोपों और रमजान का अनोखा रिश्ता, जो हो रहा है धीरे-धीरे खत्म

तोपों और रमजान का अनोखा रिश्ता, जो हो रहा है धीरे-धीरे खत्म

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मुहम्मद उमर अशरफ

17 मई 1540 को शेरशाह सूरी ने हुमायूं को हरा कर दिल्ली के तख़्त पर क़ब्ज़ा किया था। बिलग्राम के इस जंग को जीतने के बाद शेरशाह ने हुमायूँ को भारत छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। इस हार ने बाबर द्वारा बनाये गये मुग़ल सलतनत का तक़रीबन ख़ात्मा कर दिया था और उत्तर भारत पर सूरी सलतनत की शुरुआत हुई जो भारत में लोधी सलतनत के बाद दूसरा पठान सलतनत था।

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इससे पहले 27 जून 1539 को हुमायूँ और शेरशाह सूरी के बीच चौसा का युद्ध हुआ था। जहां हुमायूँ बुरी तरह पराजित हुआ और उसे अपनी जान बचाकर भागना पड़ा था। फिर चंदेल राजपूतों के ख़िलाफ़ लड़ते हुए 22 मई 1545 को कालिंजर क़िला फ़तह करने के दौरान बारूद में आग लगने कि वजह कर शेरशाह सूरी की मौत हो गई थी।

यहां पर एक बात का़बिल ए ग़ौर है कि भारत में बाबर ने पानीपत की लड़ाई (सन् 1526 ई.) में तोपों और बारूद का पहले-पहल इस्तेमाल किया था। ये तोप उसने उस्मानी तुर्कों की मदद से हासिल की थी। और ये पानीपत की पहली जंग ही थी और उस दौरान हिंदुस्तान में पहली बार किसी जंग में बारूद का इस्तेमाल किया गया था।

बाबर ने पानीपत के मैदान में उस्मानी तुर्कों की जंगी महारत को इस्तेमाल करते हुए चमड़े के रस्सों से सात सौ बैलगाड़ियां एक साथ बांध दी और जिसके पीछे तोपची और बंदूकबरदार आड़ लिए हुए थे। चूंके उस ज़माने में तोपों का निशाना कुछ ज़्यादा अच्छा नहीं हुआ करता था लेकिन जब उसके तोपची और बंदूकबरदारों ने अंधाधुंध गोलाबारी शुरू की तो कान फाड़ देने वाले धमाकों और बदबूदार धुएं ने इब्राहिम लोदी की फ़ौज के होशोहवास उड़ा दिए और इससे घरबराकर जिसको जिधर मौक़ा मिला, उधर भाग गए।

50 हज़ार सिपाहियों के अलावा इब्राहिम लोदी के पास एक हज़ार जंगी हाथी भी थे लेकिन सिपाहियों की तरह उन्होंने भी कभी तोपों के धमाके नहीं सुने थे। इसलिए पोरस के हाथियों की तारीख़ दोहराते हुए वो जंग में हिस्सा लेने के बजाय यूं भाग खड़े हुए कि उलटा लोदी की फ़ौज ही उसकी ज़द में आ गई। इब्राहिम लोदी के वहम और गुमान में भी नहीं था के उसके साथ एैसा भी हो सकता है।

बाबर के 12 हज़ार ट्रेंड घुड़सवार लड़ाके इसी पल का इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने आगे बढ़ते हुए लोदी की फ़ौज को चारों तरफ़ से घेर लिया और कुछ ही देर बाद बाबर की जीत हो गई। उस्मानी तुर्कों की जंगी महारत के अलावा इस जीत में दो तुर्क तोपचियों उस्ताद मुस्तफ़ा और अली ने अहम भूमिका निभाई थी जिन्हें बाबर ने पहले उस्मानी ख़िलाफ़ा सुल्तान सलीम अव्वल के हांथ बैत करने के बाद तोहफ़े के तौर पर हासिल किया था।

यहां पर ये तैय हो जाता है के भारते में तोप और बारूद मुग़ल उस्मानीयों की मदद से लाये। और 1857 में हिन्दुस्तान की पहली जंग ए आज़ादी में हार के साथ मुग़ल सलतनत का ख़ात्मा हो जाता है। वहीं पहली जंग ए अज़ीम में हार के साथ उस्मानी ख़िलाफ़त और सलतनत दोनो का ख़ात्मा हो जाता है। पर रह जाती है वो तोप जिसने हिन्दुस्तान में मुग़लों और सलतनत उस्मानीयां में तुर्कों का दफ़ाअ किया।

ये तो जंग का मामला हुआ, और जंग में तोप चला; पर अगर मै आपसे कहुं के आजके दौर में रमज़ान के पुरसुकून महीने में बिना किसी जंग के तोप चल रहे हैं, तो शायद आप हैरत में पड़ जाएं। लेकिन ये सच है।

भारत के राज्य मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 40 मील दूर रायसेन का हर बाशिंदा तोप को रमज़ान माह में चलते हुए देखता है। यह अनूठी परंपरा 18वीं सदी में भोपाल रियासत की बेगम ने शुरू करवाई थी जो अब तक क़ायम है। इसके इलावा राजिस्थान के कई इलाक़ो में भी तोप चलाने का परंपरा है। वैसे अनुमानित ये है कि देश में केवल रायसेन ही एैसी जगह है जहां तोप की गूंज का इंतज़ार रोज़ेदार करते हैं। सदियों बाद भी यह परंपरा क़ायम रहना इस शहर के लिए फ़ख्र की बात है, क्युंके लोग अलग अलग बहना बना कर अपने पुरानी परंपरा से छुटकारा पा ले रहे हैं।

सुबह सेहरी में शहर के साथ-साथ आसापास के 30 किमी तक के दायरे के करीब 30 गांवों तक इसकी गूंज जाती है; शाम को इफ़्तारी में गांवों तक इसकी गूंज शोर-शराबे ट्रैफ़िक के कारण कुछ कम हो जाती है। ठीक एैसी ही शुरुआत कभी फ़लस्तीन मे दौर ए उस्मानीया मे हुआ था, जहां चांद दिखने के साथ ही क़िले से कई बार तोप चलने के साथ यहां रमज़ान का आग़ाज़ होता था। फिर 30 दिनों तक सुबह सेहरी और शाम को इफ़्तारी में तोप चलने का सिलसिला बना रहता था।

ये रेवाज उस्मानीयों का शुरु किया हुआ है और उनके ज़वाल के बाद भी हुबहु क़ायम है। फ़लस्तीन और इस्राईल झगड़े के बीच भी पवित्र शहर अल-क़ूद्स (येरुशलम) में दो इस्राईली सुरक्षाकर्मी के निगरानी में आज भी तोपों की गूंज से रोज़ा खोला और रखा जाता है। कुछ लोगों का ये भी मत है के मिस्र के उस्मानी गवर्नर मुहम्मद अली ने इस पर्था की शुरुआत मिस्र की राजधानी काहिरा मे की थी।

कभी ख़िलाफ़त ए उस्मानीयां का हिस्सा रहा बलकान का अल्बानिया, बोस्निया और हर्जे़गोविनियाँ सहीत कई इलाक़ों में इसी तरह तोप दाग़कर रोजे़दारों को रोज़ा खोलने की इत्तेला दी जाती थी। तुर्की के इतिहासिक शहर क़ुस्तुन्तुनिया में भी आप रमज़ान के दौरना तोप चलते देख सकते हैं। ये सच है समय समय के साथ तोप के शकल में भी परिवर्तन आ गया है।

चूंके सलतनत उस्मानीया जिसे ओटोमन अम्पायर के नाम से जानते हैं, तीन महाद्विप में फैला था इस लिए उसके द्वारा शुरु की गई चीज़ का असर आज भी दिखता है। उसका सबसे बड़ा तुर्की के सुलतानों का इस्लामी ख़लीफ़ा होना जिनको पुरी दुनिया के मुसलमान अपना धार्मिक गुरु मानते थे। आज भी उस्मानी ख़िलाफ़त का हिस्सा रहे मिस्र, साऊदी अरब, यूएई, क़ूवैत, टूनिशिया आदी देशों में तोप से गोले दाग़ कर रमज़ान के रोज़े रखने और खोलने का रेवाज है।

अलकुद्स (येरुशलम) जैसे पवित्र शहर के इलावा मक्का और मदीना में भी रमज़ान के समय तोपें गरजती हैं, ये वहां के इतिहास का हिस्सा है।

इसके इसके इलावा भारतीय उपमहाद्विप में भी कई जगह इस रेवाज को ज़िन्दा रखा गया है, चाहे वो पाकिस्तान का सुदूर इलाक़ा हो या फिर बंगलादेश का ढाका। भारत के हैदराबाद में ये रेवाज कबका ख़त्म हो चुका है। कभी हैदराबाद के नौबत पहाड़ पर से तोप की गूंज शहर के लोगों को अफ़्तार और सेहरी का वक़्त बताती थी; पर एक तहज़ीब के ज़वाल आने के बाद बहुत सारी चीज़ें बदल गई।

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