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‘जान बचाने वाला मारने वाले से बड़ा होता है चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान’

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राहुल कोटियाल

बीते शनिवार की बात है. पेरिस में एक चार साल का बच्चा एक बहुमंजिला इमारत की बालकनी से लटक गया. ये बच्चा कभी भी नीचे गिर सकता था. नीचे तमाशबीनों की भीड़ लग गई. तभी इस भीड़ में से एक 22 साल का नौजवान निकला और अपनी जान की फ़िक्र किये बिना बालकनी-दर-बालकनी कूदते हुए ईमारत पर चढ़ता चला गया. जल्दी ही ये नौजवान उस बच्चे तक जा पहुंचा और उसे गिरने से बचा लिया.

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ये नौजवान न तो पेरिस का रहने वाला था और न फ़्रांस के किसी अन्य शहर का ही. बल्कि ये माली (पश्चिमी अफ़्रीकी देश) से आया हुआ शरणार्थी था जो फ़्रांस में अवैध रूप से रह रहा था. लेकिन जब इस नौजवान को अपनी जान पर खेलकर एक बच्चे की जान बचाते हुए पूरे फ़्रांस ने देखा तो न सिर्फ इसे सर-आँखों पर बैठा लिया बल्कि फ़्रांस के राष्ट्रपति ने इसे फ्रेंच नागरिकता देने की भी घोषणा कर दी. साथ ही इसे फ़्रांस में सरकारी नौकरी भी दी जा रही है.

लगभग ऐसी ही एक घटना कुछ दिनों पहले अपने देश में भी हुई. उत्तराखंड के गर्जिया मंदिर में एक मुस्लिम लड़का अपनी मित्र से साथ पहुंचा था. इसी दौरान भगवा गमछा डाले कुछ लोग भीड़ की शक्ल में वहां आए और लड़के से मारपीट करने लगे. इन लोगों को इस बात से आपत्ति थी कि एक मुस्लिम लड़का एक हिन्दू लड़की के साथ मंदिर में कैसे दाखिल हो गया. ये भीड़ शायद उस लड़के को पीट-पीट कर मार ही डालती लेकिन तभी उत्तराखंड पुलिस के सब-इंस्पेक्टर गगनदीप सिंह वहां पहुंच गए. गगनदीप ने भीड़ में फंसे उस लड़के को अपने सीने से लगाया और अकेले ही उस गुस्साई भीड़ को चीरते हुए उसे अपने साथ सुरक्षित निकाल लाए.

गगनदीप सिंह ने अपनी जान दांव पर लगाकर एक भारतीय नागरिक की जान ठीक उसी तरह बचाई जिस तरह फ़्रांस में उस नौजवान ने एक फ्रेंच बच्चे को बचाया. लेकिन क्या हमारी सरकारों ने गगनदीप को वैसे ही सम्मानित किया जैसे फ़्रांस में उस नौजवान को किया गया?

सम्मानित करना तो दूर, उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सरकार या केंद्र की मोदी सरकार ने गगनदीप के इस बेहद साहसिक कदम के बारे में दो शब्द भी नहीं कहे. उलटे उस क्षेत्र के विधायक ने बयान दिया है कि मुस्लिम लड़का मंदिर आया ही क्यों था और अगर प्रशासन ठीक से काम नहीं करेगा तो हमारी हिन्दू सेना ही अपने तरीकों से काम करेगी. यानी विधायक साहब ने पीठ तो थपथपाई लेकिन गगनदीप सिंह की नहीं बल्कि उस भीड़ की जो मारने पर उतारू थी. बताया जा रहा है कि गगनदीप को जान से मारने की धमकी दी रही हैं और फ़िलहाल वे भूमिगत हैं. विभाग का कहना है कि उन्हें छुट्टी पर भेजा गया है.

‘मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है.’ यह मंत्र भले ही भारतीय सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा कभी रहा हो लेकिन अब तो कत्तई नहीं है. अब यहां मारने वाला बचाने वाले से बड़ा है, उसी को प्रोत्साहन मिलता है और उसी का सम्मान होता है. चाहे इस मामले में विधायक का ‘हिन्दू सेना’ को सही ठहराना हो या शंभूनाथ रैगर जैसे हत्यारे की ससम्मान शोभायात्रा निकलना. यहां अब मारने वाले ही पूजे जा रहे हैं, वही बड़े हैं.

इस मामले में मोदी जी सच ही कहते हैं, ‘मेरा देश सच में बदल रहा है.’ बहुत तेजी से बदल रहा है.

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