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Sunday, December 5, 2021

पैगंबर मुहम्मद (सल्ल) का दुनिया को पैगाम – ‘हर इंसान एक समान’

वसीमा खान

ईद-उल मिलाद-उन-नबी त्योहार, खुदा के प्यारे रसूल हजरत पैगंबर मुहम्मद साहब की पैदाइश की खुशी में मनाया जाता है. यह त्योहार ईदों की ईद है. यदि ईद मिलादुन्नबी ना होती, तो ईद और ईद उल अजहा की खुशियां न मिलतीं.

इस्लाम के सबसे आला-अजीम नबी और आखिरी पैगंबर मुहम्मद साहब का जन्म सऊदी अरब के मक्का शहर में इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक रबी उल-अव्वल महीने की 12तारीख (22अप्रैल, 571ईस्वी) को हुआ था. अरबी कैलेंडर की इसी तारीख को पैगंबर की वफात यानी देहावसान भी हुआ था.

लिहाजा इस दिन को बारावफात भी कहते हैं. इस्लाम के अनुयायियों के लिए इस दिन की अहमियत अलग है. मुहम्मद साहब के जन्मदिन की वजह से यह दिन उनके लिए खुशियों का भी है, तो इसी रोज इंतकाल होने की वजह से गम का भी. लेकिन सारी दुनिया के मुसलमान ईद मिलाद उन-नबी के दिन को खुशी से मनाते हैं.

इस त्योहार के एक दिन पहले मस्जिदों में रात भर मुहम्मद साहब की तालीम पर बात होती है. दूसरे दिन हर जगह रैलियां और जुलूस निकालते हैं. बड़े-बड़े समारोह कर, पैगंबर मुहम्मद साहब की तालीम को लोगों तक पहुंचाया जाता है. यह सिलसिला कई दिनों तक चलता है.

पैगंबर हजरत मुहम्मद का जन्म उस दौर में हुआ, जब अरब जगत में आडंबर, कर्मकांड, सामाजिक बुराइयां और अनेक कुरीतियां, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और नवजात की हत्या आम थीं. उस जहालत भरे दौर में लड़कियों की पैदाइश को एक समाजी शर्म और तौहीन माना जाता था.

लोग बच्चियों की पैदा होते ही हत्या कर देते थे. अरब सरजमीं पर मौजूद इन बुराइयों के खिलाफ पैगंबर मुहम्मद ने सबसे पहले अपनी आवाज उठाई. जब वे इस राह पर निकले, तरह-तरह की मुश्किलें पैदा की गई. लफिर भी वे बिना किसी परवाह के आगे बढ़ते रहे.

इंसानियत और ‘एकेश्वरवाद’ का पैगाम देने वाले रसूल पैगंबर हजरत मुहम्मद, समाज में महिलाओं को सम्मान एवं अधिकार दिए जाने की हमेशा पैरोकारी करते रहे. उन्होंने बच्चियों की पैदाइश और उनकी परवरिश को जन्नत में दाखिल होने का जरिया करार दिया.

मुहम्मद साहब, औरतों के प्रति भेदभाव के खिलाफ थे. उन्होंने इनके लिए समानता की वकालत की. आज से सदियों पहले उन्होंने लड़कियों को जायदाद में मिल्कियत का अधिकार दे दिया था. पैगंबर साहब ने हमेशा अपने किरदार और बर्ताव से इंसानों को तालीम दी कि सभी इंसान एक समान हैं. एक ईश्वर की संतान हैं. लिहाजा सभी से समानता का बर्ताव करो. किसी के साथ भेदभाव न करो. सभी मिलजुल कर, भाईचारे के साथ रहो.

पैगंबर हजरत मुहम्मद की वह आला शख््िसयत थी, जिन्होंने हमेशा सच बोला. सच का साथ दिया. यहां तक कि उनके दुश्मन भी उन्हें सच्चा मानते थे. अपने कट्टर से कट्टर दुश्मनों के साथ पैगंबर साहब का बर्ताव हमेशा अच्छा होता था.

जिंदगी का ऐसा कोई भी पहलू नहीं जिसे बेहतर बनाने, अच्छाई को स्वीकार करने के लिए मुहम्मद साहब ने कोई पैगाम न दिया हो. उनकी सभी बातें इंसानों को सच की राह दिखाती हैं. उनके दुश्मनों और दोस्तों दोनों ने मुहम्मद साहब को ‘अल-अमीन’ और ‘अस-सादिक’ यानी विश्वसनीय और सत्यवादी स्वीकार किया है.

हजरत मुहम्मद साहब का पैगाम है, ‘‘कोई इंसान उस वक्त तक मोमिन (सच्चा मुसलमान) नहीं हो सकता, जब तक कि वह अपने भाई-बंदों के लिए भी वही न चाहे जितना वह अपने लिए चाहता है.’’उन्होंने झूठी प्रशंसा, गरीबों को हीन भावना से देखने, समाज के कमजोर तबकों पर जुल्म करने का हमेशा विरोध किया.

मुहम्मद साहब ने जिस इस्लाम मजहब की नींव डाली, वह उस दौर में काफी प्रगतिशील और उदार था. एकाधिकार (इजारादारी), सूदखोरी, अप्राप्त आमदनियों व लाभों को पहले ही निश्चित कर लेने, मंडियों पर कब्जा कर लेने, जमाखोरी, बाजार का सारा सामान खरीदकर कीमतें बढ़ाने के लिए कृत्रिम अभाव पैदा करना इन सब कामों को इस्लाम ने गैरकानूनी माना है.

इस्लाम में जुआ और शराब को भी गलत माना गया है, जबकि शिक्षा-संस्थाओं, इबादतगाहों तथा चिकित्सालयों की सहायता करने, कुएं खोदने, अनाथालय स्थापित करने को अच्छा काम माना है. पैगंबर-ए-इस्लाम मुहम्मद साहब ने फरमाया है कि‘‘तुम जमीन वालों पर रहम करो, तो अल्लाह तआला तुम पर भी रहम बरसाएगा.’’

खुदा के इस प्यारे रसूल ने सारी दुनिया को इंसानियत, समानता और भाईचारे का पैगाम दिया. पैगंबर साहब ने इंसानों को जिंदगी जीने का एक नया तरीका और बेहतर सलीका बताया. लोगों को सही रास्ते पर चलने की तालीम दी. पैगंबर मुहम्मद ने समूची इंसानियत को मुक्ति और मुहब्बत का पैगाम दिया.

अगर पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब की तालीमों पर विचार किया जाए, तो दो बातें उनमें सबसे अहम हैं. पहली, मुहम्मद साहब की शिक्षाएं किसी एक मुल्क या मजहब के लिए नहीं हैं. वो सबके लिए हैं. सारी दुनिया और पीड़ित मानवता के लिए हैं.

दूसरी, उनकी शिक्षाएं आज से सदियों साल पहले जितनी प्रासंगिक थीं, वे आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं. जरूरत उन शिक्षाओं को सही तरह से समझने और उन पर ईमानदारी से अनुसरण करने की है.

साभार: आवाज द वॉइस

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