‘तो राष्ट्रवाद का ईंधन बनने से बच जाएगा मुसलमान’

वसीम करम त्यागी 

पूरी दुनिया कोरोना जैसी महामारी की चपेट मे है। लेकिन भारतीय मुसलमान को संकट के दौर में दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। उसे कोरोना जैसी महामारी से भी बचना है और भारतीय मीडिया द्वाया तैयार किए गए आतंकियों/लिंचिंग गैंग से भी खुद को बचाना है। अभी तक जो ख़बरें सामने आईं हैं वे बताती हैं कि भारतीय मीडिया के प्रोपेगेंडा युद्ध ने, गांव, बस्ती, मौहल्लों, शहरों में जंगली जानवर तैयार कर दिए हैं, जो यहां आने वाले सब्जी वाले, फल बेचने वाले मजदूर का आईडी कार्ड देखते हैं, यदि वह मुसलमान है तो उस पर जानवरों की तरह टूट पड़ते हैं। अब तक आधा दसियों वीडियो सामने आ चुके हैं। इन वीडियो में ‘सभ्य’ दिखने वाले शख्स जानवरों की तरह गरीब मजदूरों पर टूट पड़ते हैं, और उन्हें धर्म सूचक गालियां देकर उन पर कोरोना फैलाने का आरोप लगाते हैं।

हरियाणा से आने वाली खबरें और भी भयावह हैं। पांच अप्रैल को जब देशभर में कोरोना आने के नाम पर ग़म/खुशी (मालूम नहीं जो भी उद्देश्य था) में दिवाली मनाई गई थी, तो हरियाणा के कई गांवों में उन मुस्लिम घरों पर हमला किया गया जिन्होंने अपने घरों की बत्ती बंद करके मोमबत्ती या दीपक नहीं जलाया था। इस तरह की घटनाएं एक समाज के दिमाग़ी रूप से संक्रमित होने का प्रमाण हैं। इतिहास एक बार फिर से नए किरदार के साथ पुरानी घटनाओं को दोहरा रहा है, भारत में मुसलमानों के साथ जो हो रहा है, वैसा जर्मनी मीडिया यहूदियों के खिलाफ संयुक्त राज्य अमेरिका में हिंदूज (वे लोग जो साऊथ एशिया से अमेरिका गए उन्हें अमेरिका में Hindoos कहा जाता है) के खिलाफ कर चुका है। ताजा उदाहरण म्यांमार का है जहां रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ चलाए गए प्रोपेगेंडा को उस स्तर पर पहुंचा दिया कि बर्मा का हर गैर रोहिंग्या नागरिक रोहिंग्या मुसलमानों से निजात पाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हो गया। इसके नतीजे में साल 2012 से लेकर 2017 तक म्यांमार में हजारों की संख्या में रोहिंग्या मुसलमान क़त्ल किए गए और सात लाख से भी अधिक रोहिंग्या मुसलमान समुन्द्री रास्ते बंग्लादेश जाकर शरण लेने पर मजबूर हो गए।

इन दिनों भारत में कोरोना के नाम पर जिस तरह मुसलमानों के खिलाफ प्रोपेगंडा युद्ध जारी है 19वीं सदी में वैसा ही युद्ध अमेरिका के वैस्टकोट में हिंदूज (साऊथ एशियन) के खिलाफ अमेरिकी मीडिया द्वारा छेड़ा गया था। अब विश्व पुराना महामारी की चपेट में है उस वक्त दिमागी बुखार इस कोरोना की तरह अपना आतंक मचाए हुए था। अमेरी राज्य West Coast में ही साऊथ एशिया से गए लोग जिनमें, हिन्दू, मुस्लिम, सिख शामिल थे रहते थे। अमेरिकी मीडिया ने दिमाग़ी बुखार के नाम पर Hindoos के खिलाफ फेक न्यूज़ प्रकाशित करनी शुरू कर दीं, मीडिया ने साऊथ एशियन के बारे में जो जो खबरें चलाएं वे खबरें वैसी ही थी जैसी खबरें इन दिनों भारतीय मुसलमानों के खिलाफ चलाई जा रही हैं यानी हिंदूज से दूर रहा करो, इन्हें छूने से दिमागी बुखार हो जाता है, इनसे दूर रहा जाए, इन्हें काम पर न रखा जाए, वगैरा-वगैरा। इस प्रोपेगेंडा युद्ध का दुष्परिणाम यह हुआ है कि 1907 में वैस्ट कोस्ट में हिंदूज के खिलाफ भयंकर दंगे हुए, जिसमें हिंदूज लोगों का जान और माल का बहुत बडा नुकसान हुआ। दंगों के बाद भी हिंदूज के के खिलाफ अमेरिकी मीडिया का प्रोपेगेंडा युद्ध जारी रहा। मीडिया अक्सर फर्जी ख़बरें प्रकाशित करता कि हिंदूज दंगों का बदला लेने के लिए हथियार इकट्ठा कर रहे हैं, वे यहां से यहां के अमेरिकियों को मारकर भगा देंगे और वैस्ट कोस्ट पर क़ब्जा कर लेंगे। हिंदूज के खिलाफ स्टेट मशीनरी, पुलिस, सेना, दंगाईयों को संरक्षण देकर दंगे कराए, नतीजा यह हुआ कि एक भी दंगाई को सजा नहीं हो पाई।

अमेरिकी मीडिया हिंदूज के खिलाफ लगातार फेक न्यूज़ चलाता रहा कि हिंदूज बदला लेंगे, अमेरिकियों को क़त्ल करेंगे, लूटेंगे वगैरा वगैरा लेकिन वैस्ट कोस्ट के हिंदूज का ऐसा कोई इरादा नहीं था, उन्होंने दंगों का बदला जरूर लिया, लेकिन यह बदला किसी की जान लेने वाला बदला नहीं था, बल्कि खुद से लिया। उन्होंने खुद को बदला, बडी संख्या में शिक्षा के महत्तव को समझते हुए पढना लिखना शुरू किया, अपने डाॅकटर्स, इंजीनियर, वकील, पत्रकार, अफसर तैयार किए। वे समझ गए कि इस दौर में सिर्फ काग़ज, क़लम ही उनका मुक़द्दर बदल सकती है। और ऐसा ही हुआ , जिस वैस्ट कोस्ट में हिंदूज के खिलाफ नफरत भड़काकर उनका क़त्ल ए आम हुआ था, उसी वैस्ट कोस्ट में आज हिंदूज सबसे ज्यादा पाॅवरफुल हैं। जिन हिंदूज के साथ हिंसा हुई थी आज वैस्ट कोस्ट में सबसे अच्छे डाॅक्टर्स भी उसी हिंदूज समुदाय से हैं। UPSC कोच समीर सिद्दीक़ी एक तथ्य की ओर ध्यान दिलाते हुए बताते हैं कि अमेरिकी मेडिकल काउंसिल की लिस्ट में 100 टाॅप डाॅक्टर्स वैस्ट कोस्ट के इसी हिंदूज समुदाय के हैं। यहां से अब भारतीय मुसलमानों और उनके मठाधीशों की जिम्मेदारी तय होती है। सवाल यह नहीं है जो हो रहा है वह क्यों हो रहा है? यह तो सभी जानते हैं कि यह क्यों हो रहा है, और किस संगठन अथवा विचारधारा को फायदा पहुंचाने के लिए हो रहा है। इसका जवाब तो हर मुसलमान के पास मौजूद है। सवाल यह है कि मुसलमानों की आगे की योजना क्या है? क्या उनके पास अगले बीस साल के लिए कोई योजना है?

इस देश में अब भी ऐसे हजारों मुसलमान मौजूद हैं जिन्होने विभाजन के दौरान भयंकर दंगे देखे, और उसके बाद से आज तक लगातार दंगे देखते आ रहे हैं। लेकिन दंगों से निपटने के लिए वे कोई योजना नहीं बना पाए, न खुद को शिक्षित किया, और न ही खुद को राजनीतिक अथवा समाजिक तौर पर सशक्त किया। सवाल है कि ऐसा क्यों है? इसका जिम्मेदार कौन है? कौन नहीं जानता कि दंगा किसके लिए खाक से उठकर सत्ता तक की सीढियां चढने की योजना है? और किसके लिए सबकुछ बर्बाद हो जाने की वजह है। मुसलमानों के खिलाफ मीडिया का प्रोपेगेंडा लगातार जारी है, जिसके दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। सवाल है कि जिन मठाधीशों ने 70 वर्षो में दंगो से बचने के लिए कोई योजना न बनाई हो क्या वे मीडिया के प्रोपेगेंडा युद्ध के काउंटर के लिए कोई योजना बना लेंगे? कमसे कम अब तो मुसलमानों को सबक़ लेना होगा, मुस्लिम मठाधीशों को कमसे कम अगले बीस साल के लिए योजना बनानी होंगी, अगर अब देर की तो इतिहास फिर खुद को दोहराएगा, कहानी एक ही होगी बस उसके किरदार बद जाऐंगे। और अगर यह कह दिया जाए तो कुछ गलत न होगा कि भारत में राष्ट्रवाद का ईंधन मुसलमान उसी तरह बनेंगे, जैसे जर्मनी में यहूदी बने, अमेरिका में हिंदूज बने और म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान बने थे।


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