Home विचार ‘हर गरीब मुसलमान को बांग्लादेशी घुसपैठिया बताना सही नहीं’

‘हर गरीब मुसलमान को बांग्लादेशी घुसपैठिया बताना सही नहीं’

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दिनकर कुमार
असम मे 30 जुलाई को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का दूसरा और अंतिम मसौदा प्रकाशित हुआ है, जिसमें 40 लाख लोगों के नाम शामिल नहीं किए गए हैं। अलग-अलग नजरिए से यह संख्या कम या अधिक मानी जा सकती है। अगर ये तमाम लोग विदेशी घुसपैठिए करार दिये जाते हैं तो निश्चित रूप से बड़ी संख्या कही जाएगी। लेकिन यह सच नहीं है। बड़ी तादाद मे दूसरे राज्यों से आए लोगों के नाम सूची से गायब हैं और एनआरसी की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। उधर राजनीति के गिद्धों के लिए यह एक सुनहरा मौका है जब वे इस आंकड़े को हथियार बनाकर नफरत का माहौल तैयार करने मे व्यस्त हो गए हैं। दूसरे राज्यों के ऐसे लाखों नागरिक हैं जो जरूरी कागज जमा नहीं कर पाने या कर्मचारियों की लापरवाही या नस्लभेद की मानसिकता के चलते सूची से खारिज हो गए हैं। ऐसे लाखों भारतीय लोगों को अवैध विदेशी नागरिक मानना उनको अपने ही देश मे मौलिक अधिकारों से वंचित करना होगा। कुछ राजनीतिक दल यही गलती कर रहे हैं, जिसका गंभीर खामियाजा देश को भविष्य में भुगतना पड़ सकता है।
एनआरसी को तैयार करने की पूरी प्रक्रिया को लेकर मीडिया में सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। इतने अहम कार्य को जिस हड़बड़ी में निपटाने की कोशिश की गई है और दस्तावेजों को लेकर जो व्यूह की रचना की गई है, उसके चलते अनेकों गरीब सूची में दर्ज होने से वंचित रह गए हैं। वैसे आश्वासन दिया गया है कि सूची से वंचित लोगों को अपनी नागरिकता को साबित करने के लिए 30 अगस्त से 30 सितंबर 2018 तक एक महीने का समय दिया जाएगा, लेकिन दस्तावेजों को लेकर अपने देश में सरकारी तंत्र के अंदर जिस तरह का भ्रष्टाचार व्याप्त है, उसे देखते हुए यह समय पर्याप्त नहीं है और पूरी संभावना है कि कम समय में बहुत सारे लोग ऐसे दस्तावेज़ जुटाने में विफल होंगे और फिर उनके साथ शरणार्थियों जैसा बर्ताव शुरू हो जाएगा। अभी सरकार कह रही है कि मसौदे में जिन लोगों के नाम नहीं आए हैं, वे सभी विदेशी घुसपैठिए नहीं हैं। विदेशियों की तादाद का निर्धारण अंतिम सूची के प्रकाशन होने के बाद ही किया जाएगा। इसका अर्थ है कि अंतिम सूची में यह संख्या 40 लाख से घट सकती है। अंतिम सूची के प्रकाशन के बाद भी वंचित भारतीय नागरिक अदालत का दरवाजा खटखटाकर अपनी नागरिकता को साबित कर सकते हैं।
असम के बाहर एनआरसी के मसौदे के प्रकाशन के बाद सांप्रदायिक शक्तियों ने सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार शुरू कर दिया है। उधर ममता बनर्जी जैसी नेता और अनेक बुद्धिजीवी भी यही कह रहे हैं कि एक ही झटके मे 40 लाख लोगों की नागरिकता छीन ली गई है। दूसरी तरफ एनआरसी प्राधिकरण और असम के तमाम जन संगठन कह रहे हैं कि मसौदे में जिनके नाम नहीं आए हैं, वे सारे लोग विदेशी नहीं हैं। उनको अपनी नागरिकता साबित करने का मौका दिया जा रहा है।
इन संगठनों का तर्क है कि मसौदे के प्रकाशन के बाद असम में किसी तरह की हिंसा नहीं हुई है। सूची से बाहर किए गए लोगों को डिटेन्शन शिविरों में बंदी नहीं बनाया गया है, न ही उनके साथ किसी तरह की मारपीट की गई है। सभी पहले की तरह स्वाभाविक जीवन गुजार रहे हैं। असम के संगठनों को इस बात पर ऐतराज है कि राज्य के बाहर के कुछ नेता और पत्रकार असम के मुसलमानों की तुलना रोहिंग्या मुसलमानों के साथ कर रहे हैं। इन संगठनों का कहना है कि कानूनी तौर पर प्रत्येक व्यक्ति को भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाएगा। उससे पहले किसी भी व्यक्ति को विदेशी घुसपैठिया बताकर राज्य से बाहर खदेड़े जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। इन संगठनों का कहना है कि बाहरी शक्तियां बेवजह लोगों के बीच भय और आशंका का वातावरण तैयार कर रही हैं। अभी तक किसी भी व्यक्ति के साथ कोई अप्रिय घटना नहीं घटी है और जिनके नाम मसौदे मे नहीं आए हैं, उनको पूरा यकीन है कि आगे की प्रक्रिया में वे अपनी नागरिकता को साबित कर पाएंगे। ऐसे बहुत सारे परिवार हैं जिनके कुछ सदस्यों के नाम सूची में आए हैं और कुछ सदस्यों के नाम छूट गए हैं। ऐसा कर्मचारियों की लापरवाही और जल्दबाज़ी की वजह से हुआ है।
संगठन या सरकार भले ही इस तरह का आश्वासन दे रहे हैं, लेकिन सरकार अपनी तरफ से भारी तादाद में सुरक्षा बलों को तैनात कर भय और आशंका का वातावरण तैयार कर चुकी है। जब पहले मसौदे का प्रकाशन किया गया, उस समय भी बड़ी तादाद में सुरक्षा बलों को तैनात किया गया और इस बार भी वैसा ही किया गया। इससे साफ पता चलता है कि सरकार की नीयत में खोट है। खुफिया एजेंसियों की मदद से सरकार आसानी से जमीनी सच्चाई का अनुमान लगा सकती है। जिस समय हिंसा की बिलकुल संभावना नहीं हो उस समय चारों तरफ सुरक्षा बलों को तैनात करने का अर्थ आम लोगों के मन मे दहशत पैदा करना ही हो सकता है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि गलतियों को सुधारने के बाद जब एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित होगी तब उससे खारिज किए गए विदेशियों की तादाद बेहद कम ही होगी। अब तक वोट बैंक की राजनीति करने वाले विदेशियों के आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते रहे हैं। असम आंदोलन के समय भी वामपंथी विचारकों ने कहा था कि विदेशियों का काल्पनिक आंकड़ा प्रस्तुत कर जन भावनाओं को भड़काने का खेल खेला जा रहा है। उनका कहना था कि विदेशियों का मुद्दा आंदोलन के नेताओं ने अपने फायदे के लिए उछाला था। उन विचारकों की बात सही थी। एनआरसी मसौदे के प्रकाशन से उनकी बात की पुष्टि हो रही है, इसमें कोई शक नहीं।
पिछले चार दशकों से इसी विदेशी घुसपैठ के मुद्दे पर राजनीति की रोटी सेंकी जाती रही है और भावनाओं को उकसाकर स्वार्थ सिद्ध करने का खेल खेला जाता रहा है। उग्र जातीयतावाद के पैरोकारों ने प्रत्येक गरीब मुसलमान के ऊपर घुसपैठी होने का ठप्पा लगा रखा है और इसी काल्पनिक घृणा के सहारे वे जन भावनाओं को उकसाने का खेल खेलते रहे हैं। अगर शुद्ध एनआरसी का प्रकाशन संभव होता है तो ऐसे अनगिनत गरीब भाषाई अल्पसंख्यकों को भयमुक्त माहौल में जीने का अवसर मिल सकेगा।
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