Home विचार इस्लाम की नज़र में महिलाओं को बराबर के हुकूक और अहम शख्सियत

इस्लाम की नज़र में महिलाओं को बराबर के हुकूक और अहम शख्सियत

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इस्लाम पुरूष व औरत दोनों का सम्मान समान रूप से करता है क्योंकि दोनो एक ही ईश्वर की रचना हैं और एक समान दर्जा रखते हैं । इस्लाम के परिपेक्ष्य में एक महिला को सम्मान, प्यार, लगाव के साथ साथ वैधानिक व सामाजिक अधिकार मिले हैं ।

एक महिला अपने जीवन में विभिन्न प्रकार जैसे एक दयालु मॉ, एक प्यारी पत्नी, एक स्नेहमयी बेटी की भूमिका निभाती है तथा ये बात कुरान की निम्नलिखित आायत में भी उल्लेखित है – “हमने मनुष्य को अपने माता – पिता के प्रति दयालु रहने के लिए आदेशित किया है। एक मां अपने बच्चे के लिए प्रसव काल से लेकर उसको जन्म देने के बाद लगभग 30 माह तक अत्यंत कष्ट सहते हुए व्यतीत करती है । जब वह 40 साल का होता है तो कहता है कि ‘ हे ईश्वर ! मुझे अपने आर्शीवाद से प्रेरित करो जिससे मै नेक पथ पर चल सकूँ और मैं अपने वंश को नेक पथ पर ले सकूँ।

पवित्र कुरान की तरह हदीस में भी महिलाओं के प्रति आदर व सम्मान का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि :- महिलाओं के सम्मान के संदर्भ में आदमी ईश्वर से अपने कर्तव्यों का निरीक्षण करे और दूसरों को भी महिलाओं से अच्छे व्यवहार करने के लिए निर्देशित करे । मैं नहीं सोचता कि बिना महिलाओं को प्यार/सम्मान दिए आदमी बेहतर होता है ।


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एक ऐसा उदाहरण है जोकि मोहम्मद पैगम्बर का महिलाओं के प्रति प्यार सदभावना को दर्शाता है। मोहम्मद साहब की फातिमा नाम की एक बेटी थी जिसे वो बहुत ज्यादा प्यार करते थे और कहते थे कि फातिमा मेरा ही अंश है  जो भी उसके साथ बुरा करेगा , वो मेरे साथ बुरा करेगा तथा जो उसे प्रसन्न रखेगा वो मुझे खुश रखेगा । वो अक्सर अपनी यात्रा से आने के बाद सबसे पहले अपनी बेटी को बुलाते और जब वो अपनी बेटी को अपनी ओर आते हुए देखते तब उनकी आंखे खुशी से चमक उठती और वो उसे प्यार से गले लगा लेते और यहां तक उसे बैठने के लिए अपनी जगह दे देते ।