Home विचार ख़ालिद अयूब मिस्बाही – ”उम्मत की क़यादत में अइम्मा का रोल”

ख़ालिद अयूब मिस्बाही – ”उम्मत की क़यादत में अइम्मा का रोल”

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ख़ालिद अयूब मिस्बाही शेरानी

आज की दुनिया और आज की दुनिया में भी सबसे ज़्यादा मुस्लिम दुनिया एकता का रोना रो रही है। एकता ना होने को ले कर हमारे मुअ़ाशरे का हर छोटा बड़ा तंक़ीद के दो लफ़्ज़ बोलना अपना फ़र्जे़ मंसबी समझता है। बड़ा अ़जीब अलमिया है कि अपनी इस्लाह के लिए कोई तैय्यार नहीं जब्कि दूसरों पर तंक़ीद से किसी को फुर्सत नहीं। इस बात का तजज़िया कोई नहीं करता कि हम खुद क्या कर रहे हैं? जब्कि यह राग हर कोई अलाप रहा है फुलां यह काम नहीं कर रहे हैं, उन्हें यह करना चाहिए। लेकिन जब हम इस हवाले से सर पकड़ कर बैठते हैं तो क़ौमे मुस्लिम ही सबसे ज़्यादा ख़ुशनसीब क़ौम नज़र आती है। इसके प्यारे मज़हब, मज़हबे इस्लाम ने रोजे़ अव्वल से रोजे़ आखि़र तक पेश आने वाले तमाम अच्छे बुरे हालात का पहले से इलाज अ़ता फ़रमा दिया है। ज़माने पर कुछ भी हालात क्यों ना बीतें, इस्लाम में उनके हल का कोई ना कोई सिरा ज़रूर मिल जाएगा।

मंसबे इमामतः इमामत के नाम पर इस्लाम में जो पाकीज़ा सिलसिला चलता है उससे मुस्लिम दुनिया का शायद ही कोई कम नसीब इलाक़ा फ़ैज़याब ना हो। मुस्लिम दुनिया से मुतअ़ल्लिक़ हर खि़त्ते में कोई ना कोई मस्जिद या नमाज़ की जगह ज़रूर मिल जाती है और हर मस्जिद से कोई ऐसा शख़्स ज़रूर जुड़ा होता है जो अल्लाह के हुज़ूर उन मुसलमानों की क़यादत और नुमाइंदगी करता है। उस अज़ीम हस्ती के लिए इस्लामी इस्तिलाह में इमाम जैसा अज़ीम लफ़्ज़ इस्तिमाल किया जाता है। डिक्शनरी के ऐतिबार से इमाम का मायना अगवा और पेशवा होता है। और किस क़दर शरफ़ की बात है कि यह पेशवाई अल्लाह की बारगाह में पूरी क़ौम की पेशवाई होती है। इस लिहाज़ से मंसबे इमामत दुनिया का सबसे बलंद व बाला मंसब है। और अगर इस मंसब में बलंदी ना रहे तो फ़िर यह इमामत कहलाने का हक़दार नहीं। यही वह मंसब है जिससे हमारे बुज़ुर्गों ने बादशाहों की पेशवाई की है। और यही वह मंसब है जिसके माध्यम से अस्लाफ़ ने हर हर मैदान में इमामत की है। फ़ारसी का मक़ूला हैः इमाम हर जा कि बाशद इमाम अस्त। यानी इमाम जिस मैदान में होता है, इमाम ही होता है।

इस मंसब की बलंदी के लिए इतना काफ़ी होना चाहिए कि खुद हुज़ूर नबी ए करीम सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम ने मस्जिदे नबवी की इमामत के वास्ते ही से सियासत से ले कर ज़िंदगी के हर हर मैदान की इमामत फ़रमाई है। मस्जिदे नबवी में सिर्फ़ नमाज़ पढ़ने पढ़ाने का सिलसिला नहीं चलता था, बल्कि वहां से सहाबा की तालीम व तर्बियत का काम भी होता था और ज़रूरत पड़ने पर मैदाने कारज़ार के लिए फ़ौजी तर्बियत का भी। बाहर से आने वाले वफ़द भी वहां ठहरते थे और वहां से दूसरे भी बहुत से दीनी व दुन्यवी काम अंजाम पाते थे।

बल्कि आज तक हमारी शरीअ़त में निकाह का सुन्नत तरीक़ा यही है कि मस्जिद में हो। जब्कि आज हमारे यहां निकाह का इस्लामी तसव्वुर मुबहम सा हो कर रह गया है और इस अ़ज़ीम सुन्नत पर समाजी रस्मों का ग़लबा है। फ़िर भी आखि़र ऐसा क्यों? इसका सीधा सा जवाब यही है कि हमारी मस्जिदें सिर्फ़ हमारी नमाज़़ों का मर्कज़ नहीं, बल्कि हर कारे ख़ैर का मर्कज़ हैं और हर वह काम जिसमें पूरी क़ौम नहीं बल्कि क़ौम के एक आदमी का भी भला हो, वह काम मस्जिद से किया जा सकता है और किया जाना चाहिए। क्योंकि यह तैय है कि एक आदमी के निकाह में पूरी क़ौम के ईमान व अ़मल का कोई फ़ाइदा नहीं। अब इस रोशन हक़ीक़त के बाद हमें यह बात माननी पड़ेगी कि बारगाहे खुदावंदी में तमाम मुसलमानों की नुमाइंदगी करने वाले अइम्मा ए किराम का मंसब अ़ज़मतों का मीनार है। और यह इमाम सिर्फ़ मुसल्ला ए इमामत पर या सिर्फ़ नमाज़ के इमाम नहीं बल्कि हर जगह इमाम हैं और हर तरह इमाम हैं। शायद यही वजह है कि इस्लामी नुक़्ता-ए-नज़र से इमामत का सबसे ज़्यादा हक़दार वह है जो सबसे ज़्यादा पढ़ा लिखा हो, फ़िर वह जो सबसे बड़ा क़ारी हो, फ़िर वह जो ज़्यादा परहेज़गार हो और फ़िर वह जो सबसे ज़्यादा उम्र वाला हो।

यह है हक़ीक़त लेकिन आज के दौर में अगर यह बात कही जाए कि इमाम हर जगह और हर तरह इमाम है तो क्या बात मज़ाक़ नहीं मालूम होगी? आखि़र ऐसा क्यों? इस लिए कि आज उस इमामत का तसव्वुर जहां अ़वाम के दिल व दिमाग़ से उठ चुका है, वहीं खुद इमामों ने भी अपने आपको एक हद तक अनकही ग़ुलामी की जंजीरों में झकड़ रखा है। हक़ व हक़्क़ानिय्यत और खुदा की रज़्ज़ाक़ियत से भरोसा उठ चुका है और माद्दा परस्ती का दौर दौरा है। ज़ाहिर सी बात है ऐसे हालात में खुदा की मदद भी हमारे साथ नहीं होगी और फ़िर हम दीन के नाम पर एक पाकीज़ा मुजस्समे से ज़्यादा हैसियत के हामिल नहीं हो सकते।

एक ज़माना था जब बग़दाद की जामा मस्जिद की इमामत के लिए इमाम ग़ज़ाली के पास बादशाह की फ़रमाइश ले कर वजीर-ए-अ़ाज़म गया। इमाम ग़ज़ाली ने पूछाः आप आए हैं। खुद बादशाह क्यों नहीं आया? वज़ीर चला गया और बादशाह यह अ़र्ज़ ले कर हाज़िर हुआ कि हुज़ूर हमारी जामा मस्जिद की इमामत कु़बूल फ़रमा लें। आप बादशाह से फ़रमाते हैंः सुनो! मैं इस शर्त पर इमामत कु़बूल करूॅगा कि अगर तुम ने कुछ भी शरीअ़त के खि़लाफ़ किया तो मुसल्ला ए इमामत पर खड़े होने से पहले मैं तुम्हारे खि़लाफ़ हुक्म नाफ़िज़ करूंगा और तुम्हें उसे मानना होगा। बादशाह ने जब यह शर्त मंज़ूर की तब आपने इमामत कु़बूल फ़रमाई।

जब इमाम ऐसे होते थे तब बादशाहों जैसे मुक़तदी भी शर्तें मंज़ूर करते थे और आज अगर इमामत बे क़द्र है तो इसके कुछ क़ुसूरवार हम भी हैं। इसे गुस्ताखी कहा जाए या उससे बड़ा कोई लफ़्ज़ दिया जाए, क़ुरआन की रोशनी में देखा जाए तो हक़ीक़त कुछ इसी क़िस्म की है। क्या ख़ूब इरशाद हैः यह इस लिए कि अल्लाह किसी क़ौम से उसको दी हुई नेअ़मत उस वक़्त तक नहीं बदलता, जब तक वह खुद ना बदल जाऐ और बेशक अल्लाह सुनता जानता है। (सूरह अनफ़ाल, आयत नम्बर 53)
बेशक अल्लाह किसी क़ौम से अपनी नेअ़मत नहीं बदलता जब तक वह खुद अपनी हालत ना बदल दे। (सूरह रअ़द, आयत नम्बर 11)

जुमा की तक़रीरेंः मामूली मामूली तबदीलियों के साथ लग-भग हिंदूस्तान भर में दिनों के सरदार जुमा के दिन तक़रीरों का सिलसिला चलता है। हाज़िरीन की ख़ासी तादाद होती है। इमाम साहब को बयान का ख़ासा वक़्त मिलता है। यह सिलसिला क़ौम की इस्लाह के तअ़ल्लुक़ से इस क़द्र अहमियत का हामिल है कि इससे बड़े-बड़े मैदान सर किए जा सकते हैं। बल्कि करने वालों ने ऐसा किया भी है। शर्त यह है कि अंदाज़े खि़ताबत में जान हो और मेटर भी ख़ूब जामे हो। और यह सब उस वक़्त हो पाएगा जब हमारे इल्म में मजबूती, नज़र में बसीरत, फ़िक्र में गहराई और मिज़ाज में ऐतिदाल हो। चूँकि अ़ाम तौर से ये बातें नहीं पाई जातीं, जिसकी वजह से हम गलियारों की हदों तक महदूद हो कर रह जाते हैं। संजीदा और पढ़ा लिखा तबक़ा हमारे मौज़ूअ़ात से इत्तिफाक़ नहीं रखता और ना ही ज़िंदा-दिली से सुनता है। वरना जुमा की तक़रीर कोई मामूली चीज़ नहीं बल्कि यह पूरी मिल्लत का धारा पलटने के बराबर है। किसी ने बड़ी सच्ची बात कही हैः इमाम लोग अगर चाहें तो एक दिन में पूरी मिल्लत की काया पलट कर रख दें। जुमा के खि़ताब की एक अहम बात यह भी है कि उसे बड़े एहतिराम व अ़क़ीदत से सुना जाता है क्योंकि जुमा का वक़्त वह पाकीज़ा वक़्त होता है जो कई लिहाज़ से दिलों पर असर अंदाज़ होता है। उस वक़्त हकीमाना अंदाज़, मोअस्सिर लहजे और नए उस्लूब के साथ जो पैग़ाम दिया जाएगा दिल की गहराइयों में असर अंदाज़ होगा।

अ़ाम तौर से मस्जिदों के इमाम हज़रात ही जुमा की तक़रीरें भी करते हैं और वही नमाज़े पंजगाना के भी इमाम होते हैं। ज़ाहिर सी बात है इस लिहाज़ से उन से ख़ास मुक़्तदियों की दिन में कई मर्तबा और अ़ाम मुक़्तदियों की कम से कम हर हफ़्ता देखने सुनने की हद तक ज़रूर मुलाक़ात होती है। इतनी ज़्यादा मुलाक़ातों के बाद अगर हम अपने मुक़्तदियों की नज़र में अपना वक़ार बहाल रखने में कामयाब हो जाते हैं और हर हफ़्ता उनके दिलों को ऐसा फ़तह कर लेते हैं कि वह हमारे हर पैग़ाम को दिल से क़ुबूल करने के लिए हर वक़्त तैयार हों तो यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं, हाॅ! इसे कामयाबी का पहला ज़ीना कहा जाएगा। और जिस इमाम की यह पोज़ीशन भी ना हो उसे अपनी इमामत, इज़्ज़त, हैसियत, कामयाबी और शख़्सियत पर नज़रे सानी करनी चाहिए।

लेकिन दूसरी ओर सच्चाई यह भी है कि यह काम कुछ इतना आसान नहीं जितना पहली नज़र में समझा जाता है। इसके लिए कई एक उलूम ना सही फ़ुनून की ज़रूर ज़रूरत पेश आती है। जब्कि ज़्यादातर अइम्मा का मेअ़यारे इल्म व फ़न ना क़ाबिले बयान होता है। ऐसे में इस बात की बड़ी सख़्त ज़रूरत महसूस होती है कि अइम्मा ए किराम की नुमाइंदगी के लिए कोई मेअ़यारी रिसाला होना चाहिए जो उन्हें हर माह ताज़ा, मुनासिब और इल्मी मवाद, माक़ूल अंदाज़े बयान, फ़िक्री गहराई और हुस्ने तदबीर फ़राहम कर सके। अल हम्दु लिल्लाह माहनामा एहसास का एक अहम तरीन ख़ामोश मक़सद यह भी है। अब यह अइम्मा ए किराम पर है वह कम से कम अपने भले और अपनी शख़्सियत साज़ी के लिए इससे कितना वाबस्ता होते हैं और कितना बिदकते हैं।

वल्लाह! इस ज़मीनी सच्चाई में कोई शक नहीं कि ना हमारी कोई इल्मी हैसियत है और ना हम इस लाइक़ कि अइम्मा ए किराम को कोई अदना सा मशवरा भी दे सकें लेकिन यह भी हैरतनाक बल्कि अफ़सोसनाक सच्चाई है कि इमामत जैसे सबसे बड़े सिस्टाॅमेटिक और प्लानिंग से किए जाने वाले काम के लिए आज तक हमारे पास कोई सिस्टम नहीं। और कोई मुनज़्ज़म प्लानिंग नहीं। ज़्यादा से ज़्यादा कहीं कहीं तंज़ीमुल अइम्मा नामक कोई तहरीक मिल जाती है जो जलसे जुलूस और दूसरे मसाइल की हद तक कुछ काम करती है और बस। खुद मंसबे इमामत के हवाले से कोई ख़ास प्लानिंग हमारी मालूमात में कहीं नहीं। इसका नतीजा यह है कि हर इमाम अपनी सवाब दीद या अपने मिज़ाज के मुताबिक़ जो समझता है बोलता है, जो चाहता है करता है और इस तरह एक जामे प्रोग्राम बेफ़ैज़ हो कर रह जाता है। ऐसे में हालात चीख़ चीख़ कर मुतालबा कर रहे हैं, जिनकी तकमील बहर हाल ज़रूरी है।

तर्ज़े खि़ताबतः अ़ाम तौर से तमाम खुतबात और ख़ास तौर से खुतबाते जुमा का अंदाजे़ बयान वही होना चाहिए जो नबवी उस्लूबे बयान रहा है। क़ुरआन के दिए हुए दावती मिज़ाज को सामने रखते हुए नर्म मगर भरोसे वाला लब व लहजा, बार बार क़ुरआनी आयतों और हदीसों से मज़बूत इस्तिदलाल और सुुनने वालों की तबीअ़त और उनकी जरूरतों को सामने रखते हुए जो बात कही जाए वो क़ाबिले कु़बूल ना हो, ऐसा नहीं हो सकता। शरीअ़त को किसी पर थोंपा ना जाए क्योंकि अल्लाह तअ़ाला के दीन में कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं, बल्कि शरीअ़त को ज़रूरत बना कर पेश किया जाए। इस्लाम नेचूरल धर्म है, इसके फ़ित्री तक़ाज़ों को पेशे नज़र रखा जाए।

मिंबरे रसूल का ना जाइज़ फ़ाइदा ना उठाया जाए और उसे अपने नजी मुअ़ामलात की हद तक ना ले जाया जाए। अक्सर ऐसा होता है अइम्मा ए किराम अपने पर्सनल मसाइल मिंबर से सुलझाते हैं जिससे ज़ातियात अ़ामियात बन जाती हैं और एक नया फ़ित्ना जन्म ले लेता है। इससे जहां इमामत का वक़ार मजरूह होता है वहीं खुद इमाम की इमेज भी डाउन होती है और इसके नतीजे में वह सब कुछ होता है जो बयान के लाइक़ नहीं।
मौजूदा हालातः करंट इशूज़ पर ख़तीब की गहरी निगाह होनी बहुत ज़रूरी है। क्योंकि जब तक निगाह में गहराई नहीं होगी उस वक़्त तक खि़ताबत का हक़ अदा नहीं किया जा सकता। गली कूचों के मसाइल से ले कर इंटरनेश्नल मंज़र नामे तक तमाम हालात ख़तीब की नज़र में हों और फ़िर यह कुव्वत भी हो कि किसी भी पहलू के दो हिस्सों में से हक़ व बातिल और सही व ग़लत क्या है, इसका फ़ैसला कर सके। क़ौम का मफ़ाद किस राह में है और कौन सा रास्ता ख़तरनाक है, इस सिलसिले में सियासी गर्मबाज़ारी हो या तिजारती मंडिया, बढ़ते हुए जराइम हों या तरक़्क़ी की नई शाहराहें, सब पर नज़र और फ़िक्र दोनों ज़रूरी है।

इस मक़सद के लिए जहां उलूमे शरीअ़त पर पकड़ चाहिए वहीं मेअ़यारी अख़बार व रसाइल और दूसरे किताबी सिलसिलों की ख़रीद व फ़रोखत और उन पर गहरी नज़र भी चाहिए। क्योंकि बगै़र मेहनत के जब एक घर तामीर नहीं हो सकता तो एक अच्छे मुअ़ाशरे की तशकील कैसे हो सकती है और जब एक दीवार के मेअ़मार को मेहनत करनी पड़ती है तो पूरी मिल्लत के मेअ़मार के लिए बगै़र मेहनत के क्या चारा है। अ़ाम तौर से देखा जाता है कि अइम्मा ए किराम इस तरफ़ बहुत कम तवज्जो करते हैं। यह जहां कामयाब क़यादत से महरूमी की निशानी है वहीं अपनी शख़्सियत साज़ी भी इससे हट कर मुम्किन नहीं। इस मसरफ में अगर माहवार हज़ार रुपये भी ख़र्च हों तो शायद बेजा नहीं लेकिन हो क्या रहा है, यह दिल ख़राश दास्तान लिखने की ज़रूरत नहीं, हमारे ख़ाली कमरे हमारी मुतालअ़ों की चुग़ली ख़ुद खाते हैं।

क़ुव्वते इस्तिदलालः ख़तीब जो बात कहे उस पर अगर मुम्किन हो तो शरीअ़त यानी क़ुरआन, हदीस, फिक़्ह और बुज़ुर्गों की रविश से दलील पेश करे और मुंतख़ब मौज़ू के तमाम गोशों पर खुल कर ऐसी बेहस करें कि तमाम इश्कालात का दरवाज़ा बंद हो जाए। अगर यह मुम्किन ना हो तो क़यास के उसूलों को मलहूज़ रखें। और तमाम चीज़ों के साथ भारतीय संविधान पर भी कड़ी नज़र होनी ज़रूरी है। ज़ाहिर सी बात है इस किस्म की तमाम मतलूबा चीजें एक जगह जमा होना मुम्किन नहीं बल्कि इसके लिए ख़ूब मुतालअ़ा चाहिए या फ़िर मख़सूस तौर पर इस तरफ़ मुनज़्ज़म पेशक़दमी चाहिए।
सालाना शेडयूलः अइम्मा ए किराम को चाहिए कि साल भर का एक साथ शेड्यूल बना लें ताकि बार बार तकलीफ़ ना उठानी पड़े और काम भी मुनज़्ज़म हो। हाॅ! अगर वक़्ती तौर पर उसमें कोई तबदीली करनी पड़े तो करते रहें।

दूसरी ख़ूबियाॅः इमामत का मंसब जैसा अ़ज़ीम मंसब है उसके लिए ख़ूबियाॅ भी उसी क़द्र चाहिए। एक इमाम के लिए बुन्यादी तौर पर क़ुरआन व हदीस के बाद फ़िक़्ह का गहरा मुतालअ़ा बे पनाह ज़रूरी है। यह इल्म जहाॅ बा बरकत फ़न है वहीं हर हर दौर की हर हर ज़रूरत पूरी करने के ऐतिबार से भी इसका बहुत ही अहम मक़ाम है।
ज़ाती तौर पर इमाम को मिलनसार और ख़ुश अख़्लाक़ होना लग-भग फ़र्ज़ है। क्योंकि अख़्लाक़ के बग़ैर असर अंदाज़ी मुम्किन नहीं और जब तक यह ना हो किसी बड़े काम का ख़्वाब मुकम्मल नहीं हो सकता।

ख़ुश अख़्लाक़ी में अगर सीरते नबवी की बू पैदा हो जाए तो बनावट की कोई ज़रूरत नहीं पेश आएगी। इस ज़िम्न में एक अहम काम यह है कि मख़्लूक़ की ज़रूरत बन जाया जाए। वैसे भी अल्लाह की मख़्लूक़ इतनी परेशान रहती है कि एक दर्दमंद दिल उस पर बेचैन हुए बिना नहीं रह सकता। ख़ुद्दारी, ज़हन साज़ी, सियासी बसीरत, संजीदगी, क़ुव्वते फ़ैसला, तदब्बुर, तदबीर, अ़मली इक़दामात, तालीमी फ़रोग़, इस्लाह पसंदी वग़ैरह वह पाकीज़ा औसाफ़ हैं कि अगर इमामत अपने आपको इन औसाफ़ की हामिल बना लेती है तो कोई वजह नहीं कि एक बार फ़िर दौरे रिसालत पनाह सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम की याद ताज़ाा ना हो जाए। और अगर हम अपनी देरीना रिवायतों को एक लम्हा छोड़ने के लिए तैयार नहीं तो फ़िर दुनिया में जो बे क़द्री हो अपनी जगह, आखि़रत की रूस्वाई से हमें कोई नहीं बचा सकता। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हमें तौफ़ीक़े ख़ैर मरहमत फ़रमाए और कम से कम अपने आपका भला सोचने की तौफ़ीक़ दे।

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