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कानून जानें: भारत में शॉपलिफ्टिंग की सजा

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अक्सर लोग बाजार जाते हैं और कई बड़े-बड़े सामान लेते हैं. बड़े-बड़े सामानों का तो लोग/ग्राहक भुगतान कर लेते हैं लेकिन कुछ ऐसे छोटे सामान होते हैं जिन पर ग्राहकों की नजर जाती है और ग्राहकों को वह चीजें पसंद तो आती है लेकिन वह उसका भुगतान नहीं करना चाहते . अब कोई भी दुकानदार फ्री में तो कुछ देता है नहीं तो जिसे वह चीज पसंद आती है वह उसे उस दुकान से बिना किसी की अनुमति के चुपके से निकाल देता है, इसे शॉपलिफ्टिंग कहते हैं. आज हम आपको बतायेंगे की भारत में इसकी सजा क्या है?

शॉपलिफ्टिंग या चोरी ? 

शॉपलिफ्टिंग की तुलना चोरी शब्द से भी की जा सकती है, जिसे इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है की – दुकान या कही पर भी जो व्यापारिक जगह हो वहाँ पर चोरी करना ही शॉपलिफ्टिंग है. शॉपलिफ्टिंग को किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी संपत्ति के मालिक की अनुमति के बिना अवैध रूप से संपत्ति पर कब्ज़ा करना माना जाता है. शॉपलिफ्टिंग में वह सामान आते हैं जिन्हें ग्राहक दूकानदार को बिना किसी भुगतान के उसे उस दुकान में लाने के इरादे से जाता है. डेल्ही में टॉप क्रिमिनल लॉयर कई बार इस प्रश्न का सामना करते हैं की चोरी और शॉपलिफ्टिंग में फर्क क्या है?

यह है दोनों में फर्क 

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शॉपलिफ्टिंग भी चोरी का एक परिणाम है जिसका उद्देश्य बिना किसी भुगतान के दुकानों या स्टोरों से सामान लाना है, वहीं चोरी एक व्यापक शब्द है जिसमे गलत व्यक्ति होने के इरादे के साथ किसी की संपत्ति पर कब्ज़ा करना है. चोरी से दूसरों को नुकसान पहुँच सकता है. चोरी करने में जो व्यक्ति जिस व्यक्ति की चोरी करता है उसे नुकसान होता है और चोरी करने वाले व्यक्ति को भी गलत लाभ पहुँचता है तो वहीं चोरी शॉपलिफ्टिंग की तरह दुकानों ही तक सीमित नहीं है.

भारत में, शॉपलिफ्टिंग को एक अलग अपराध के रूप में नहीं माना जाता है, लेकिन भारतीय दंड संहिता के अध्याय XVII के तहत यह निपटाया जाता है जिसमें संपत्ति के खिलाफ अपराध शामिल होते हैं. भारतीय दंड संहिता शॉपलिफ्टिंग को एक अलग अपराध के रूप में नहीं मानती है, लेकिन इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 379 के तहत दंडनीय चोरी के रूप में माना जाता है.

कोड की धारा 378 चोरी को एक अधिनियम के रूप में परिभाषित करती है, जो कोई किसी व्यक्ति के कब्जे से, उसकी सम्मति के बिना, कोई चल सम्पत्ति बेईमानी से ले लेने का आशय रखते हुए उस सम्पत्ति को हटाता है, उसे चोरी करना कहा जाता है.

चोरी के अपराध की अनिवार्यताएं निम्न हैं.:

जब तक कोई वस्तु भूबद्ध रहती है, चल सम्पत्ति न होने के कारण चोरी का विषय नहीं होती; किन्तु ज्यों ही वह भूमि से अलग की जाती है वह चोरी का विषय होने योग्य हो जाती है

संपत्ति को कानूनी रूप से रखने वाले व्यक्ति के कब्जे से बाहर किया जाना चाहिए, इसके परिणामस्वरूप उस व्यक्ति को इससे गलत लाभ हुआ होगा जिसने पीड़ित को गलत नुकसान पहुंचाया है.

अभियुक्त का अनिवार्य रूप से एक बेईमान इरादा होना चाहिए.

चीज लेना जरूरी है कि वह व्यक्ति की सहमति के बिना ली गयी हो. यह खंड अपनी कक्षा में अभिव्यक्त और निहित सहमति दोनों लेता है. इस प्रकार, चोरी के अपराध को आकर्षित करने के लिए न तो व्यक्त या निहित सहमति उपस्थित होना चाहिए.

संपत्ति को धोखाधड़ी से लेने के इरादे से किसी भी तरह से स्थानांतरित किया जाना चाहिए.

शॉपलिफ्टिंग शरारत के अंदर नहीं आती है 

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि धारा 378 के तहत यह आवश्यक नहीं है कि चोरी की गयी संपत्ति मालिक से ली गई हो. यह जरूरी नहीं है कि संपत्ति उस व्यक्ति के स्वामित्व में हो जिसकी संपत्ति चोरी हो गई हो. धारा 378 कब्जे पर केंद्रित है और कहता है कि संपत्ति किसी के कब्जे में होनी चाहिए. यह दर्शाता है कि संपत्ति मालिक या फिर किसी की भी हो सकती है. एक व्यक्ति के पास अगर कोई संपत्ति है और वह वहाँ मालिक के रूप में काम करता है तो वह कानून के अनुसार मालिक नहीं हो सकता है .

शॉपलिफ्ट को अपराध नहीं माना जा सकता है इसे केवल चोरी के रूप में जाना जा सकता है.

शॉपलिफ्टिंग केवल एक शरारत नहीं है. शरारत को ऐसी स्थिति में संदर्भित किया जाता है जिससे एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को नुकसान पहुंचाता है लेकिन खुद भी कुछ हासिल नहीं करता है जबकि शॉपलिफ्टिंग दुसरे को नुकसान पहुंचा कर खुद को गैर-लाभ देता है.

अपराध दंडनीय है या नहीं ? 

शॉपलिफ्टिंग के मामलों में भारत में सर्वश्रेष्ठ आपराधिक वकील अक्सर एक प्रश्न का सामना करते हैं कि क्या अपराध दंडनीय है या नहीं?

जब शॉपलिफ्टिंग के अपराध की जांच की जाती है तो यह चोरी के अपराध के सभी आवश्यक तत्वों को पूरा करने के लिए देखा जाता है और इसलिए भारतीय दंड संहिता की धारा 379 के तहत इसे दंडनीय बना दिया जाता है. धारा 379 के तहत संहिता बताती है कि जो भी चोरी करता है उसे किसी भी अवधि के लिए कारावास के साथ दंडित किया जाता है ,जिसे 3 साल तक की जेल हो सकती है या फिर बड़ा जुर्माना हो सकता है या जुर्माना और जेल दोनों हो सकती है.

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