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नोटबंदी के सबसे पुरजोर समर्थक पत्रकार ने भी माना, नोट बंदी ने तोड़ दी किसानो और अर्थव्यवस्था की कमर

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नई दिल्ली | 8 नवम्बर 2016 को प्रधानमंत्री मोदी ने 500 और 1000 के नोट बंद करके देश में हलचल मचा दी. उस समय काफी लोगो ने मोदी के इस कदम को मास्टरस्ट्रोक करार दिया. लेकिन कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्होंने इस कदम को देश के लिए आत्मघाती कदम करार दिया. इसलिए नोट बंदी के मामले में विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री और पत्रकार दो खेमों में बंट गए.

ऐसे ही एक पत्रकार थे आर जगन्नाथ , जिन्होंने नोट बंदी के पक्ष में खुलकर बोला और लिखा. उस समय आर जगन्नाथ का मानना था की मोदी सरकार का यह कदम काले धन की कमर तोड़ देगा. फ़िलहाल नोट बंदी हुए 8 महीने से ज्यादा का समय हो चूका है. लेकिन हालात अभी भी सामान्य नही हुए है. यही नही कुछ रिपोर्ट्स से यह बात भी उजागर हुई है की मोदी सरकार के इस कदम से अर्थव्यवस्था को गहरा आघात लगा है.

इसके अलावा किसानो ने भी कर्ज माफ़ी के लिए आन्दोलन शुरू कर दिया है. इन हालातो के बीच आर जगन्नाथ ने भी मान लिया की नोट बंदी फेल थी और इसने अर्थव्यवस्था के साथ साथ किसानो की कमर तोड़ दी.  दक्षिणपंथी मैगजीन ‘स्वराज्य’ में लिखे अपने लेख में जगन्नाथ ने माना की उन्होंने नोट बंदी के बारे में गलत अनुमान लगाया था. उन्होंने लिखा की यह मिया कल्पा (गलती मानने) का समय है.

जगन्नाथ आगे लिखते है,’ अब खासकर कर्ज माफ़ी के लिए किसान आन्दोलन के बाद , मुझे लगता है की नोट बंदी के बहीखाते में लाभ के मुकाबले हानि का कॉलम ज्यादा भरा है. यह फेल हो गयी है. मोदी के 500 और 1000 के नोट अवैध घोषित करने के 7 महीने बाद खर्च , फायदे पर भारी पड़ रहा है. मैं मानता हूँ की किसानो की कर्ज माफ़ी की मांग सीधे नोट बंदी से जुडी हुई है.

जगन्नाथ यही नही रुके उन्होंने आगे लिखा ,’ अब यह स्पष्ट हो गया है की नोट बंदी वो आखिरी कदम था जिसने किसानो की कमर तोड़ दी. जिससे किसानो के विरोध की एक श्रंखला शुरू हो गयी और कर्ज माफ़ी जैसी राजनितिक मांग भी उठने लगी. मोदी सरकार के इस कदम से इतना नुक्सान होगा जितना पहले कभी नही हुआ. किसानो को इतना नुक्सान पिछले दो सालो से पड़ रहे सूखे से भी नही हुआ.