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यहां दलित महिलाएं नहीं निकाल सकतीं कुएं से पानी

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गर्मी से चिलचिलाती दोपहर में बेचाराजी गांव की कुछ महिलाएं अपने बर्तनों के साथ कुएं से कुछ कदमों की दूरी पर बैठती हैं। वे पास से गुजर रहे कुछ युवकों से कुएं से पानी निकालने का अनुरोध करती हैं पर कुछ फायदा नहीं होता। इंतजार करते-करते डेढ़ घंटा बीत जाता है, तभी एक बुजुर्ग महिला वहां आती है और कुएं से पानी निकालकर अपने बर्तन से उन महिलाओं के बर्तनों को भरने लगती है।

 dalit women
पानी के इतने पास होने के बावजूद भी जाति इन दलित महिलाओं को अपनी प्यास बुझाने की इजाजत नहीं देती। 20 हजार लोगों के इस गांव में ऐसे 200 दलित परिवार हैं जो हर रोज अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी के इतने पास होने के बावजूद किसी के आने का इंतजार करते हैं। वह कुआं जिसमें से ऊंचे घरों की महिलाएं पानी निकालती है, उसे ‘अछूत’ होने के नाते इन महिलाओं को छूने का अधिकार नहीं है।

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 1927 में ‘महाद सत्याग्रह’ का शुभारंभ किया, जिसमें उन्होंने सार्वजनिक पानी की टैंकी से पानी निकालने के लिए दलितों का नेतृत्व किया। वह यह संदेश देना चाहते थे कि कोई भी अछूत नहीं हैं। पर मेहसाणा के इस गांव की यह परंपरा जो पिछले नौ दशकों से चली आ रही है, यह सिद्ध करती है कि आंबेडकर का काम अधूरा ही रह गया।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह गांव पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम आनंदीबेन पटेल के गृह राज्य में पड़ता है। 25 साल की चंद्रिका सिसौदिया बोलती हैं कि हम वाल्मीकि समुदाय से हैं और हम लोगो को गांव के कुएं को छूने की अनुमति नहीं मिली है। 45 साल की शारदाबेन सोलंकी का कहना है कि कुएं से पानी निकालने के लिए उनके समुदाय की स्त्रियों को किसी दयालु भारवाड़ महिला का इंतजार करना पड़ता है।

गांव के सरपंच कानुभाई भारवड़ के पिता पोपटभाई कहते हैं कि हम दलितों को कुएं से पानी निकालने की अनुमति नहीं देते। यह हमारी परंपरा है और हम इसे मानते हैं।

दलित अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता कौशिक परमार कहते हैं सरकार को आंबेडकर के नाम पर कार्यक्रम आयोजित करने के बजाय कुएं से पानी निकालने की इजाजत देकर जाति की दीवारों को तोड़ने पर ध्यान देना चाहिए।