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पद्म भूषण गुलजार का तंज , हमें राजनीतिक आजादी मिली लेकिन सांस्कृतिक नही

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बंगलौर | मशहूर गीतकार और पद्म भूषण गुलजार ने देश के वर्तमान हालातो पर चिंता जताते हुए कहा की हम केवल राजनितिक तौर पर आजाद हुए है जबकि सांस्कृतिक तौर अभी आजाद होना बाकी है. उन्होंने देश के कॉलेजो में अंग्रेजी साहित्यों के साथ कालिदास की कृतियों को भी शामिल करने की मांग की. इसके अलावा उन्होंने नए और आधुनिक साहित्यकारो को भी कॉलेज पाठ्यक्रम में जगह देने की बात कही.

रविवार को गुलजार ने बंगलौर कवि सम्मलेन 2017 में शिरकत की. यह कार्यक्रम के बुकस्टोर द्वारा आयोजीत किया गया था. कवि सम्मलेन से इतर बोलते हुए गुलजार ने कहा की गैर हिंदी भाषाओं को राष्ट्रिय भाषा नही कहना गलत होगा क्योकि हिंदी के अलावा बाकि भाषाए भी काफी प्राचीन है और ये देश की प्रमुख भाषाए है. इसलिए इन्हें आंचलिक कहना सही नही है. तमिल प्राचीन और प्रमुख भाषा है.

गुलजार ने आगे कहा की बांग्ला, गुजरती, मराठी और अन्य भाषाओ का भी देश में उतना ही महत्व है जितना हिंदी का. इस दौरान उन्होंने कॉलेज पाठ्यक्रमो में भारतीय साहित्यों को शामिल करने की मांग की. उन्होंने कहा की अगर कॉलेजो में ‘पैराडाइस लॉस्ट’ जैसी कृतिया पढ़ाई जा सकती है तो फिर कालिदास, युधिष्ठिर और द्रोपदी क्यों नही? ये कृतिया हमारी संस्कृतियों के ज्यादा नजदीक है इसलिए हर कोई इनसे जुडाव महसूस करता है और समझ सकता है.

मौजूदा हालातो पर गुलजार ने कहा की मुझे लगता है की हम अभी भी सांस्कृतिक तौर पर आजाद नही हुए है. हमें राजनितिक आजादी मिल गयी लेकिन सांस्कृतिक नही. हम अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता से बंधे हुए है. गुलजार ने इस बात पर भी दुःख जाहिर किया की नीलआर्म स्ट्रोंग और डॉ कलबुर्गी जैसे लोगो की मौत पर भी देश में कुछ नही लिखा गया. मैंने इन दोनों पर कविता लिखी. क्योकि कविता ही कवि की भावना को दर्शाती है.