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मोदी कह रहे कार्ड स्वैप करो कैशलेस बनो, बैंकों को लग रहा 3800 करोड़ रूपए का चूना

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मुंबई | नोट बंदी का एलान करते समय प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था की कालेधन के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए यह फैसला लिया जा रहा है. लेकिन इसके कुछ दिनों बाद ही गोल पोस्ट बदलकर कहा गया की देश की अर्थव्यवस्था को कैशलेस करने के लिए यह मुहीम शुरू की गयी. उस समय सरकार ने लोगो से डेबिट या क्रेडिट कार्ड का ज्यादा इस्तेमाल करने की अपील की. हालाँकि उस समय इसके अलावा कोई विकल्प भी नही था.

लोगो के पास कैश नही था इसलिए खरीदारी के लिए कार्ड का ही ज्यादा इस्तेमाल हुआ. इसका नतीजा यह हुआ की अकेले दिसम्बर में ही 89,200 करोड़ रुपये का कैशलेस ट्रांजैक्शन हुआ. जो एक रिकॉर्ड था. लेकिन अब यह मुहीम भी धीमी पड़ती दिख रही है. लोग वापिस उसी ढर्रे पर लौट रहे है. जिससे कैशलेस इकॉनमी का नारा भी एक जुमला दिखाई देने लगा है.

एक ताजा रिपोर्ट सामने आने के बाद ऐसा लग रहा है की बैंक यह नही चाहते है की लोग कार्ड का ज्यादा इस्तेमाल करे. एसबीआई की रिपोर्ट के अनुसार कैशलेस ट्रांसेक्शन की वजह से बैंकों को सालाना 3800 करोड़ रूपए का चूना लग रहा है. इसलिए सरकार की इस मुहीम से बैंकों को काफी नुक्सान उठाना पड़ रहा है. इसके कारण गिनाते हुई एसबीआई ने कहा की कैशलेस लेनदेन के लिए स्ट्रक्चर न होने की वजह से ऐसा हो रहा है.

दरअसल नोट बंदी के समय देश में काफी कम जगहों पर कैशलेस लेनदेन करने की मशीन थी. इन मशीनो को पॉइंट ऑफ़ सेल टर्मिनल कहा जाता है. इसलिए नोट बंदी के बाद बैंकों पर इन मशीनो की संख्या बढाने का दबाव बढ़ा. रिपोर्ट के अनुसार बैंकों ने जुलाई 2017 तक करीब 28.4 लाख पीओएस मशीने लगाए है. इसका मतलब यह हुआ की नोट बंदी के बाद बैंकों ने रोजाना 5 हजार पीओएस मशीन लगाई है.

जिसमे बैंकों का 4700 करोड़ रूपए का खर्च आया है. जबकि अगर कमाई की बात करे तो बैंकों को कार्ड स्वाइप के नाम पर 900 करोड़ रूपए की कमाई हुई है. इसलिए बैंक करीब 3800 करोड़ रूपए के नुक्सान में है. एसबीआई की रिपोर्ट में सरकार को सलाह दी गयी है की अगर वो कैशलेस की और जाना चाहते है तो पहले इन्टरनेट स्ट्रक्चर को दुरुस्त करना होगा.